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Tenant Rights: किरायेदार का हक़ कब तक...भाड़ा देना छोड़ा तो अधिकार भी ख़त्म! हाईकोर्ट का सख़्त फ़ैसला

Tenant Rights: कानूनी दायरे में किरायेदार के हक़ को लेकर हाईकोर्ट ने अहम और नज़ीर कायम करने वाला फ़ैसला सुनाया है। इ

Tenant Rights: किरायेदार का हक़ कब तक...भाड़ा देना छोड़ा तो
किरायेदार का हक़ कब तक...- फोटो : social Media

Tenant Rights:  कानूनी दायरे में किरायेदार के हक़ को लेकर हाईकोर्ट ने अहम और नज़ीर कायम करने वाला फ़ैसला सुनाया है। इलाहाबाद हाई कोरट ने साफ़ शब्दों में कहा कि किरायेदार का अधिकार तभी तक कायम रहता है, जब तक वह बाक़ायदा किराया अदा करता है, संपत्ति पर क़ब्ज़े में रहता है और बेदखली के आदेश का मुक़ाबला करता है। जैसे ही वह परिसर खाली कर देता है, उसका हक़ खुद-ब-खुद समाप्त हो जाता है। ऐसी सूरत में अलग से बेदखली नोटिस देना लाज़िमी नहीं।

यह आदेश न्यायमूर्ति अजित कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने वाराणसी निवासी फरमान इलाही की याचिका खारिज करते हुए पारित किया। याची ने दाल मंडी क्षेत्र में सरकारी ध्वस्तीकरण की कार्रवाई को चुनौती दी थी। वह मकान संख्या सीके 39/5, कुंडिगढ़ टोला में किरायेदार था और मकान मालिक शहनवाज खान द्वारा 27 दिसंबर 2025 को राज्य सरकार के पक्ष में निष्पादित बिक्री पत्र पर एतराज़ जता रहा था।

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याची का दावा था कि उसे पूर्व में मिली अंतरिम सुरक्षा का संरक्षण हासिल है और वह भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अधिनियम 2013 की धारा 2(10) के तहत “इंटरेस्टेड पर्सन” की श्रेणी में आता है। लिहाज़ा अधिग्रहण से पहले उसे धारा 21 के तहत नोटिस दिया जाना चाहिए था।

राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता श्रुति मालवीय ने दलील दी कि किरायेदार को संपत्ति के स्वामित्व पर कोई विधिक अधिकार नहीं, इसलिए वह बिक्री पत्र को चुनौती देने का पात्र नहीं। साथ ही यह भी कहा गया कि याची ने अधूरी और बिना तारीख़ वाली तस्वीरें पेश कर अदालत से अंतरिम राहत हासिल करने की कोशिश की, जबकि संपत्ति पूर्णतः ध्वस्त हो चुकी थी।

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रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद अदालत ने पाया कि 30 जुलाई 2025 को दाल मंडी में सड़क चौड़ीकरण हेतु आदेश जारी हुआ था और स्वामी की सहमति से संपत्ति राज्य के पक्ष में विक्रय की गई। कब्ज़ा सौंपे जाने के बाद ध्वस्तीकरण वैधानिक प्रक्रिया के तहत हुआ।

अदालत ने स्पष्ट किया कि जब ढांचा ही अस्तित्व में नहीं रहा तो अंतरिम सुरक्षा का कोई औचित्य नहीं। ध्वस्तीकरण की तिथि जैसे तथ्यात्मक विवाद रिट क्षेत्राधिकार में तय नहीं किए जा सकते। इस फ़ैसले ने किरायेदारी हक़ की सीमाएं स्पष्ट कर दी हैं।