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भारत का वह नवाब जिसका था अपना निजी रेलवे स्टेशन, ड्राइंग रुम के नजदीक तक पहुंचती थी ट्रेन

Desk : देश में किसी का पास अपना निजी रेलवे स्टेशन और ट्रेन हो यह जानकर आपको थोड़ा आश्चर्य होगी। लेकिन यह सच है। आज हम आपको एक ऐसे शख्स की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसके पास खुद का रेलवे स्टेशन था...

भारत का वह नवाब जिसका था अपना निजी रेलवे स्टेशन, ड्राइंग रुम

Desk : भारत के इतिहास में रियासतों की विलासिता के किस्से अक्सर चर्चा में रहते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश की रामपुर रियासत के नौवें नवाब, हामिद अली खान, की कहानी सबसे जुदा है। नवाब हामिद अली खान एक ऐसी शख्सियत थे, जिनकी शान-ओ-शौकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके पास अपना निजी रेलवे स्टेशन था। यह महज एक स्टेशन नहीं था, बल्कि उनकी शाही जीवनशैली का एक अभिन्न हिस्सा था, जो उस दौर के सबसे आधुनिक संसाधनों पर उनके एकाधिकार को दर्शाता था।


ड्राइंग रुम के करीब तक पहुंचती थी पूरी ट्रेन

नवाब की सुविधा के लिए बिछाई गई ये रेलवे लाइनें सीधे उनके महल, 'कोठी खास बाग', के अंदर तक जाती थीं। दुनिया में शायद ही ऐसा कोई दूसरा उदाहरण मिले जहां एक पूरी ट्रेन किसी व्यक्ति के ड्राइंग रूम के इतने करीब पहुंचती हो। जब भी नवाब को कहीं जाना होता या बाहर से कोई विशिष्ट मेहमान रामपुर आता, तो ट्रेन सीधे महल के प्रांगण में आकर रुकती थी। इस व्यवस्था ने नवाब हामिद अली खान को भारतीय इतिहास का सबसे रसूखदार रेल यात्री बना दिया था।

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चलते-फिरते महल जैसी थी ट्रेन की बोगियां

रामपुर का यह निजी रेलवे स्टेशन और लाइन उस समय की इंजीनियरिंग का एक बेजोड़ नमूना थी। बताया जाता है कि इस पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर की आज की बाजार दर के हिसाब से कीमत करोड़ों में है। नवाब ने न केवल स्टेशन बनवाया, बल्कि उनके पास अपनी निजी आलीशान बोगियां भी थीं, जो किसी चलते-फिरते महल से कम नहीं थीं। इन डिब्बों में सोने-चांदी की नक्काशी और रेशमी परदे लगे होते थे, जो नवाब के रूतबे को चार चांद लगाते थे।


इतिहासकारों के लिए कौतूहल का विषय रहा यह ट्रेन और स्टेशन

नवाब हामिद अली खान सिर्फ अपनी रईसी के लिए ही नहीं, बल्कि कला और शिक्षा के प्रति अपने अनुराग के लिए भी जाने जाते थे। उनके शासनकाल में रामपुर सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बना। हालांकि, उनके पास मौजूद यह निजी ट्रेन और स्टेशन हमेशा से आम जनता और इतिहासकारों के लिए कौतूहल का विषय रहा। यह इस बात का प्रमाण था कि रामपुर रियासत आर्थिक रूप से कितनी समृद्ध थी कि वह अपनी निजी परिवहन व्यवस्था का खर्च उठाने में सक्षम थी।

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आज भी जब रामपुर की गलियों में इतिहास की चर्चा होती है, तो नवाब हामिद अली खान की इस 'शाही सवारी' का जिक्र जरूर आता है। हालांकि अब वे रेल पटरियां और वो दौर बीत चुका है, लेकिन महल की दीवारों के बीच आज भी उस समय की गूंज सुनाई देती है जब इंजन की सीटी सीधे नवाब के बेडरूम तक सुनाई देती थी। नवाब हामिद अली खान की यह कहानी भारतीय रेल के इतिहास में एक सुनहरे और विलासी अध्याय के रूप में दर्ज है।