घन घमंड नभ गरजत घोरा...मेघों की गर्जना, राम का विरह और तुलसी का दर्शन, वर्षा ऋतु में प्रकृति बनी जीवन के सत्य की पाठशाला, पढ़िए विरह, विनय और विवेक का मौसम क्यों है वर्षा ऋतु

Rainy Season: वर्षा की हर बूंद अपने साथ केवल जल नहीं लाती। वह मनुष्य को भीतर से देखने का अवसर भी देती है। मेघ सिखाते हैं कि उपलब्धियों के बाद भी विनम्र रहना चाहिए, पर्वत बताते हैं कि कटु वचनों के बीच धैर्य नहीं खोना चाहिए...

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घन घमंड नभ गरजत घोरा।प्रिया हीन डरपत मन मोरा- फोटो : Hiresh Kumar

Rainy Season: ग्रीष्म की प्रचण्ड उष्णता से संतप्त धरती जब प्रथम वर्षा-बूंदों का स्पर्श पाती है, तब मानो समस्त प्रकृति में नवजीवन का संचार हो जाता है। आकाश में घनघोर मेघ उमड़ते-घुमड़ते हैं, विद्युत् दामिनी क्षण-क्षण दमकती है, पवन शीतलता का संदेश लेकर आता है और सूखी धरती हरितिमा की चादर ओढ़ लेती है। भारत में सामान्यतः मध्य जून से सितंबर तक वर्षा का क्रम चलता है। यही काल कृषक, वनस्पति, जीव-जंतु और समस्त पर्यावरण के लिए जीवनदायिनी शक्ति लेकर आता है।वर्षा की हर बूंद अपने साथ केवल जल नहीं लाती। वह मनुष्य को भीतर से देखने का अवसर भी देती है। मेघ सिखाते हैं कि उपलब्धियों के बाद भी विनम्र रहना चाहिए, पर्वत बताते हैं कि कटु वचनों के बीच धैर्य नहीं खोना चाहिए, नदियां मर्यादा का स्मरण कराती हैं और हरित धरती नवजीवन की आशा जगाती है। श्रीराम का सीता-वियोग यह भी बताता है कि प्रकृति का उल्लास तब तक पूर्ण नहीं हो सकता, जब तक अंतर्मन में शांति न हो।वर्षा केवल जलवृष्टि की ऋतु नहीं, बल्कि प्रकृति, मानवीय संवेदना और जीवन-दर्शन के समन्वय की ऋतु है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस के किष्किंधा कांड में वर्षा का जो सजीव चित्रण किया है, वह भारतीय साहित्य में प्रकृति-वर्णन का अप्रतिम उदाहरण है। श्रीराम जब अनुज लक्ष्मण के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर निवास कर रहे हैं, तब वर्षा ऋतु का आगमन होता है। किंतु बाह्य प्रकृति में उल्लास के साथ श्रीराम के अंतर्मन में सीता-वियोग की वेदना भी तीव्र होती जाती है।बाबा तुलसी लिखते हैं- घन घमंड नभ गरजत घोरा।प्रिया हीन डरपत मन मोरा॥


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आकाश में गर्वोन्मत्त मेघों की घोर गर्जना हो रही है, किंतु प्रिय सीता के वियोग में श्रीराम का मन व्याकुल है। यही तुलसी की काव्य-दृष्टि की विशेषता है—एक ओर प्रकृति का विराट सौंदर्य है, तो दूसरी ओर विरह-वेदना से संतप्त मानव-हृदय। बाह्य जगत उल्लासित है, पर अंतर्मन शोकाकुल।तुलसीदास प्रकृति के प्रत्येक दृश्य को नैतिक एवं आध्यात्मिक उपमा से जोड़ देते हैं। मेघों में चमकती और तत्काल विलीन हो जाने वाली विद्युत् के माध्यम से वे दुष्ट व्यक्ति की अस्थिर प्रीति का चित्र खींचते हैं -“दामिनि दमक रह न घन माहीं।खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं॥” 

वहीं वर्षा से पूर्व पृथ्वी के समीप झुकते हुए मेघों में तुलसी विनय का आदर्श देखते हैं-“बरषहिं जलद भूमि निअराएँ।जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ॥”अर्थात् जैसे मेघ जल से परिपूर्ण होकर पृथ्वी की ओर झुकते हैं, वैसे ही वास्तविक विद्वान ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात अहंकाररहित और विनम्र हो जाते हैं। यह केवल प्रकृति-वर्णन नहीं, बल्कि ज्ञान और विनय का शाश्वत सूत्र है।वर्षा की बूँदों का पर्वत पर पड़ना भी तुलसी के लिए एक गहन जीवन-संदेश है-“बूँद अघात सहहिं गिरि कैसे।खल के बचन संत सह जैसे॥”जिस प्रकार पर्वत वर्षा की असंख्य बूँदों का आघात सहन करता है, उसी प्रकार संतजन दुष्टों के कटु वचनों को धैर्यपूर्वक सहन करते हैं। प्रकृति का प्रत्येक दृश्य यहाँ मानवीय चरित्र का दर्पण बन जाता है।

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छोटी नदियों का उफनना और मर्यादा तोड़ना तुलसी को अल्प धन पाकर उद्दंड हो जाने वाले व्यक्ति की याद दिलाता है-“छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई।जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥”इसके विपरीत जल का क्रमशः एकत्र होकर सरोवर में भरना सज्जनों के पास सद्गुणों के संचय का प्रतीक बनता है। नदी का समुद्र में विलीन होकर स्थिर होना जीवात्मा के परमात्मा में लीन होने की आध्यात्मिक संकल्पना को व्यक्त करता है।वर्षा से धरती पर चारों ओर हरितिमा छा जाती है। घास इतनी घनी हो जाती है कि पथ तक दृष्टिगोचर नहीं होते। तुलसी इसे पाखंड के विस्तार से सद्ग्रंथों के अप्रकट हो जाने की उपमा देते हैं। दूसरी ओर मेढकों की सामूहिक ध्वनि उन्हें वेदाध्ययन करते हुए विद्यार्थियों के समुदाय जैसी प्रतीत होती है। वृक्षों पर आए नवीन पल्लव साधक के विवेक-जागृत मन के समान दिखाई देते हैं।वर्षा ऋतु का यह वर्णन केवल सौंदर्य का आख्यान नहीं है। इसमें धर्म, नीति, ज्ञान, विनय, संयम, सत्संग और आत्मबोध जैसे जीवन-मूल्यों का विराट दर्शन समाहित है। कभी प्रचण्ड वायु मेघों को तितर-बितर कर देती है, तो तुलसी इसे कुपुत्र द्वारा कुल-धर्म के विनाश से जोड़ते हैं। कभी दिन में घोर अंधकार छा जाता है और फिर सूर्य का प्रकाश प्रकट होता है यह दृश्य कुसंग से ज्ञान के नष्ट होने और सत्संग से उसके पुनर्जागरण का प्रतीक बन जाता है।

वर्षा के इस विराट चित्र में श्रीराम की विरह-वेदना भी समानांतर चलती रहती है। प्रकृति का उल्लास उनके लिए पीड़ा का कारण बन जाता है, क्योंकि प्रिय सीता उनके साथ नहीं हैं। मोरों का मेघ देखकर नृत्य करना उन्हें ऐसे गृहस्थ की भाँति प्रतीत होता है, जो किसी विष्णुभक्त को देखकर प्रसन्न हो उठता है। इस प्रकार तुलसी ने प्रकृति और पुरुष के अंतर्मन को एक ही भाव-सूत्र में बाँध दिया है।

 वसंत को ऋतुराज कहा गया है, किंतु वर्षा की अपनी विशिष्ट महिमा है। कालिदास से लेकर तुलसीदास तक भारतीय कवियों ने वर्षा को केवल प्राकृतिक घटना नहीं माना, उन्होंने उसमें जीवन का पुनर्जन्म, विरह की तीव्रता और आत्मचिंतन की संभावना देखी है। वर्षा आती है तो धरती तृप्त होती है, वनस्पतियाँ प्रफुल्लित होती हैं, कृषक के जीवन में आशा का संचार होता है और प्रकृति नवीन रूप धारण करती है। 

रामचरितमानस हमें यह भी सिखाता है कि बाह्य संसार का प्रत्येक परिवर्तन मनुष्य के अंतर्मन के लिए एक संदेश लेकर आता है। मेघ विनय सिखाते हैं, पर्वत धैर्य, नदी मर्यादा, हरित धरती नवजीवन और प्रकाश-अंधकार सत्संग-कुसंग का भेद।यही कारण है कि वर्षा ऋतु भारतीय संस्कृति में केवल जल बरसाने वाली ऋतु नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन बरसाने वाली ऋतु भी है। इसकी प्रत्येक बूँद प्रकृति को ही नहीं, मनुष्य के अंतःकरण को भी सींचती है।

हीरेश कुमार