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Dementia: कितनी घातक है डिमेंशिया बीमारी, याददाश्त की गिरावट से पहचान तक की होती है परेशानी, पढ़िए डॉक्टर रोहित उपाध्याय की अहम सलाह

Dementia: अल्ज़ाइमर डिमेंशिया का सबसे आम और पेचीदा रूप माना जाता है, जो धीरे-धीरे इंसान की याददाश्त और शख्सियत पर गहरा असर डालता है।

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घातक है डिमेंशिया बीमारी- फोटो : Hiresh Kumar

Dementia: अल्ज़ाइमर डिमेंशिया का सबसे आम और पेचीदा रूप माना जाता है, जो धीरे-धीरे इंसान की याददाश्त और शख्सियत पर गहरा असर डालता है। इसकी शुरुआत आम तौर पर हल्की भूलने की शिकायत से होती है, लेकिन वक्त के साथ मरीज समय, स्थान और अपने करीबी लोगों को पहचानने में भी मुश्किल महसूस करने लगता है।

आईजीआईएमएस के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. रोहित उपाध्याय के मुताबिक, अल्ज़ाइमर एक प्रगतिशील न्यूरोडीजेनेरेटिव मर्ज़ है, जिसमें मस्तिष्क की न्यूरॉन कोशिकाएँ धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होकर नष्ट होने लगती हैं। इस प्रक्रिया का असर संज्ञानात्मक क्षमताओं (कॉग्निटिव फंक्शन) पर पड़ता है।

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डॉ. उपाध्याय बताते हैं कि डिमेंशिया कोई एकल बीमारी नहीं, बल्कि लक्षणों का एक समूह है। इसमें याददाश्त का कमजोर होना, बातचीत के दौरान सही शब्द तलाशने में दिक्कत, निर्णय लेने की क्षमता में कमी, व्यवहार और व्यक्तित्व में बदलाव, कन्फ्यूज़न, अवसाद (डिप्रेशन) और रोज़मर्रा के कामों में निर्भरता बढ़ना जैसे लक्षण शामिल हैं। मरीज धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता खोने लगता है, जिससे परिवार पर भी मानसिक और भावनात्मक दबाव बढ़ता है।

हालांकि डिमेंशिया और अल्ज़ाइमर को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन कुछ एहतियाती कदम इसके जोखिम को कम कर सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार नियमित शारीरिक व्यायाम, संतुलित और पौष्टिक आहार, दिमाग को सक्रिय रखने वाली गतिविधियाँ जैसे पढ़ना, पहेलियाँ हल करना या नई चीज़ें सीखना फायदेमंद हैं। साथ ही ब्लड प्रेशर और शुगर को नियंत्रण में रखना, धूम्रपान और शराब से परहेज़ करना तथा सामाजिक रूप से सक्रिय रहना मस्तिष्क की सेहत को बेहतर बनाए रखता है।

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डॉ. रोहित उपाध्याय स्पष्ट करते हैं कि फिलहाल इन बीमारियों का कोई स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है, लेकिन दवाओं, कॉग्निटिव थैरेपी, लाइफस्टाइल में बदलाव और समय पर मेडिकल इंटरवेंशन से लक्षणों की रफ्तार को धीमा किया जा सकता है। सही देखभाल और समर्थन से मरीज की जीवन-गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार संभव है।