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Digital Addiction: डिजिटल नशे ने घटाया आईक्यू लेबल, स्क्रीन-सिंड्रोम की चपेट में जेन-जी, दिमागी सेहत पर खतरे की बज रही है घंटी, 80 देशों के रिसर्च के आंकड़े जानकर घूम जाएगा दिमाग

जेन-जी यानी 15 से 27 साल के युवा पहली ऐसी नस्ल बन गए हैं, जिनका आईक्यू Intelligence Quotient अपने माता-पिता की पीढ़ी से कम दर्ज किया गया है।

Digital Addiction Cuts IQ Gen Z at Risk Global Study Warns
जेन-जी के दिमागी सेहत पर खतरे की बज रही है घंटी- फोटो : social Media

Digital Addiction: जब भी दो लोग नई जनरेशन की बात करते हैं तो आम तौर पर यही कहा जाता है कि अगली पीढ़ी पहले से ज्यादा स्मार्ट, तेज़ और एडवांस होती है। इसी सोच के चलते किसी भी अपडेटेड चीज़ को “न्यू जनरेशन” का तमगा दे दिया जाता है। लेकिन हाल ही में सामने आई कुछ अंतरराष्ट्रीय स्टडीज़ ने इस आम धारणा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इन रिसर्च रिपोर्ट्स के मुताबिक, जेन-जी यानी 15 से 27 साल के युवा अपने पहले वाली पीढ़ी की तुलना में कम इंटेलिजेंट पाए गए हैं। स्टडीज़ में दावा किया गया है कि जेन-जी का आईक्यू लेवल, याददाश्त (हिफ़्ज़ा), ध्यान केंद्रित करने की क्षमता (तवज्जो) और समस्या सुलझाने की समझ पिछली जनरेशन के मुकाबले कमजोर हुई है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इसकी एक बड़ी वजह डिजिटल टेक्नोलॉजी पर बढ़ती निर्भरता है। मोबाइल, टैबलेट और छोटे वीडियो कंटेंट ने पढ़ने-सोचने की गहराई को कम किया है। रिसर्चर्स इसे सिर्फ शैक्षणिक नहीं, बल्कि दिमागी सेहत से जुड़ा गंभीर मुद्दा बता रहे हैं, जिस पर वक्त रहते ध्यान देना जरूरी है।

न्यूरोसाइंस की दुनिया से आई एक चौंकाने वाली मेडिकल चेतावनी ने पूरी पीढ़ी को कटघरे में खड़ा कर दिया है। जेन-जी यानी 15 से 27 साल के युवा पहली ऐसी नस्ल  बन गए हैं, जिनका आईक्यू Intelligence Quotient अपने माता-पिता की पीढ़ी से कम दर्ज किया गया है। यह सनसनीखेज खुलासा अमेरिकी सीनेट की कमेटी में न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. जैरेड कुनी हॉरवाथ ने किया।

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डॉ. हॉरवाथ के मुताबिक, यह गिरावट सिर्फ आईक्यू तक सीमित नहीं है, बल्कि मेमोरी (हिफ़्ज़ा), अटेंशन स्पैन (तवज्जो), रीडिंग कॉम्प्रिहेन्शन, मैथमैटिकल प्रोसेसिंग और प्रॉब्लम सॉल्विंग एबिलिटी—सब पर असर पड़ा है। मेडिकल भाषा में कहें तो यह एक तरह का कॉग्निटिव डिक्लाइन है, जिसकी जड़ में है डिजिटल ओवरडिपेंडेंस।

दिमाग छोटे वीडियो के लिए नहीं बना

डॉ. हॉरवाथ ने साफ कहा कि इंसानी दिमाग की न्यूरल आर्किटेक्चर छोटे वीडियो, रील्स और टूटी-फूटी लाइनों से सीखने के लिए नहीं बनी। डीप लर्निंग और लॉन्ग-टर्म मेमोरी कंसोलिडेशन आमने-सामने की बातचीत, किताबों की गहरी पढ़ाई और तसली से सोचने से होती है—स्क्रीन स्क्रॉल करने से नहीं। उन्होंने बताया कि 2010 के बाद बच्चों की बौद्धिक क्षमता में लगातार गिरावट दर्ज की गई।

यूरोप का यू-टर्न: फिर लौट रही किताब

इस खतरे को भांपते हुए स्वीडन ने स्कूलों से टैबलेट हटाकर फिर कागज-कलम और प्रिंटेड किताबों की वापसी की है। फ्रांस, नीदरलैंड्स, ब्रिटेन और फिनलैंड ने भी एडटेक (EdTech) पर लगाम कसी है। यूनेस्को की रिपोर्ट भी आगाह कर चुकी है कि जब तक तकनीक सीखने में मददगार न हो, उसका ज्यादा इस्तेमाल तालीम के लिए नुकसानदेह है।

अति-आत्मविश्वास: जेन-जी की सबसे बड़ी बीमारी

विशेषज्ञों के मुताबिक जेन-जी की एक बड़ी कमजोरी है ओवरकॉन्फिडेंस सिंड्रोम। उन्हें अपनी कॉग्निटिव कमज़ोरी का एहसास ही नहीं। शिक्षा विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि बच्चों को स्मार्टफोन देने में देरी की जाए, छोटे बच्चों को जरूरत पर फ्लिप फोन दिए जाएं और स्कूलों में टेक्नोलॉजी पर राष्ट्रीय स्तर पर नियंत्रण हो। इसे उन्होंने “सामाजिक आपातकाल” करार दिया।

5 घंटे स्क्रीन = सबसे कम स्कोर

80 देशों के डेटा पर आधारित इस रिसर्च में सामने आया कि जो बच्चे रोज़ 5 घंटे कंप्यूटर पर पढ़ते हैं, उनके अकादमिक स्कोर सबसे कम होते हैं। जब “हर छात्र-एक डिवाइस” नीति लागू हुई, तो नतीजे तेज़ी से गिरते चले गए।