Bihar coaching industry: कोचिंग कल्चर पर सवाल, ट्रिक्स की पढ़ाई खत्म कर रही है छात्रों की मौलिक सोच?IIT तक पहुंच तो मिल रही, पर समझ क्यों नहीं?

महंगी कोचिंग और बढ़ती असमानता, क्या शिक्षा बन गई है अमीरों का खेल?

कोचिंग कल्चर पर सवाल
कोचिंग कल्चर पर सवाल- फोटो : Social media

Bihar coaching industry:देश की शिक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल खड़ा करते हुए  IIT डायरेक्टर प्रो. सुमन चक्रवर्ती ने कोचिंग इंडस्ट्री को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि आज का छात्र मौलिक सोच और प्रतिभा के विकास के बजाय “ट्रिक्स आधारित सफलता” की राह पर चल पड़ा है, जो आगे चलकर उसके लिए संकट बन रही है।

दरअसल, कोचिंग संस्थानों का बढ़ता वर्चस्व अब शिक्षा के मूल उद्देश्य को ही बदलता नजर आ रहा है। पहले जहां कोचिंग एक सहायक भूमिका निभाती थी, वहीं आज यह छात्रों के भविष्य का निर्धारक केंद्र बन गई है। छात्र अब विषय को गहराई से समझने के बजाय केवल जेईई जैसी परीक्षाओं में सही विकल्प चुनने की तकनीक सीख रहे हैं।

Diarch GO

इसका परिणाम यह हो रहा है कि छात्र प्रतिष्ठित संस्थानों जैसे आईआईटी खड़गपुर में प्रवेश तो पा लेते हैं, लेकिन वहां की उच्च गुणवत्ता वाली पढ़ाई के साथ तालमेल नहीं बैठा पाते। सेमेस्टर सिस्टम और सेल्फ-स्टडी आधारित शिक्षा में उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जिससे कई छात्र बैकलॉग और मानसिक तनाव का शिकार हो जाते हैं।

शिक्षा के इस कोचिंग मॉडल ने सामाजिक असमानता को भी गहरा किया है। महंगी कोचिंग लेने में सक्षम संपन्न वर्ग के छात्र आगे निकल जाते हैं, जबकि सीमित संसाधनों वाले प्रतिभाशाली छात्र पीछे छूट जाते हैं। कई मध्यमवर्गीय परिवार बच्चों के भविष्य के लिए कर्ज लेकर कोचिंग का खर्च उठाते हैं, जिससे आर्थिक दबाव और मानसिक तनाव दोनों बढ़ते हैं।

NSIT
Nsmch

दूसरी ओर, बोर्ड परीक्षाओं में 100 फीसदी अंक देने की प्रवृत्ति ने भी प्रतिस्पर्धा की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं। एक तरफ कुछ बोर्डों में उदार मूल्यांकन है, तो दूसरी ओर कई राज्य बोर्डों में कड़े मूल्यांकन के कारण छात्र राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते हैं।

कोचिंग संस्थानों की स्पून फीडिंग पद्धति छात्रों को रटने की आदत डाल देती है, जबकि उच्च तकनीकी संस्थानों में विश्लेषणात्मक सोच और आत्म-अध्ययन की जरूरत होती है। यही अंतर आगे चलकर छात्रों के आत्मविश्वास को तोड़ देता है और कई बार गंभीर मानसिक तनाव की स्थिति पैदा कर देता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि इस प्रवृत्ति पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो यह देश की उच्च शिक्षा प्रणाली के लिए दीर्घकालिक खतरा बन सकती है। जरूरत है कि नीति-निर्माता इस दिशा में ठोस कदम उठाएं, ताकि शिक्षा ट्रिक्स नहीं, बल्कि सोच और समझ पर आधारित हो और हर छात्र को समान अवसर मिल सके।