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The great proclamation of Kabir Das: कबीरदास की महाघोषणा, हे मानव! आत्ममंदिर में जागृत करो ज्योति, अन्यथा अधोगति निश्चित...

The great proclamation of Kabir Das: अंतःकरण में स्थित चंचल मन ही तुझे नामस्मरण से विमुख कर अधर्ममार्ग की ओर प्रवृत्त करता है। ...

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कबीरदास की महाघोषणा- फोटो : X

The great proclamation of Kabir Das: “मन मथुरा दिल द्वारिका, काया काशी जानी। दशम द्वार देहुरा, तामें ज्योति पिचानी॥”

यह दिव्य वचन केवल बाबा कबीर का काव्य नहीं, अपितु स्वयं कबीर दास की चेतावनी है। हे मानव! अब भी समय है संभल जा, जागृत हो जा। तेरे अंतःकरण में स्थित चंचल मन ही तुझे नामस्मरण से विमुख करता है। वहीं तुझे सत्कर्म से विचलित कर, बाह्य आडंबर में उलझा देता है।

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हे मनुष्य! अब जागृत हो जा। अंतःकरण में स्थित चंचल मन ही तुझे नामस्मरण से विमुख कर अधर्ममार्ग की ओर प्रवृत्त करता है। तू देवालयों में केवल आडंबर हेतु उपस्थित होता है, चंदन-तिलक धारण कर भक्ति का प्रदर्शन करता है, किंतु मनोमंदिर की शुद्धि का यत्न नहीं करता। हे जीव! श्रवण कर परमेश्वर बाह्य तीर्थों में सीमित नहीं, वह तेरे हृदयगुहा में नित्य विराजमान है। अपने मन को मथुरा, हृदय को द्वारिका तथा इस काया को काशी स्वरूप पावन मान। अंतर्मन में स्थित दिव्य ज्योति का साक्षात्कार कर; वहीं परमात्मा सुलभ है।

तू देवालयों में जाता है, किंतु भक्ति का आचरण प्रदर्शन मात्र रह जाता है। चंदन का तिलक ललाट पर सुशोभित होता है, परंतु अंतर्मन मलिन ही रहता है। स्मरण रख ईश्वर बाह्य तीर्थों में सीमित नहीं; वह तो तेरे हृदयगुहा में नित्य प्रतिष्ठित है।

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अपने मन को मथुरा मान, जहाँ श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ, हृदय को द्वारिका समझ, जहाँ धर्मसंस्थापन का पुरुषार्थ प्रकट हुआ; और इस देह को काशी तुल्य पवित्र तीर्थ जान। काशी, जहाँ स्वयं शिव तत्व का वास है। जब तू अंतर्मन को पावन करेगा, तब वही परमात्मा साक्षात् अनुभूत होगा।

शरीर में स्थित दशम द्वार जिसे ब्रह्मरंध्र अथवा आज्ञाचक्र कहा गया है वही वास्तविक देवालय है। वहाँ स्थित परमज्योति का साक्षात्कार तभी संभव है, जब मनोनिग्रह और सतत रामनाम जप तेरा जीवनधर्म बन जाए।

राम नाम की महिमा अनंत है। स्वयं महादेव भी रामनाम के परम उपासक माने गए हैं। गृहस्थाश्रम में स्थित रहकर भी यदि तू जिह्वा पर राम और कर्म में धर्म धारण करे, तो जीवन स्वयं तीर्थयात्रा बन जाता है।

बाह्य यात्राएँ सीमित फलदायिनी हैं; अंतःशुद्धि ही मोक्षमार्ग का द्वार है। जब तक मन रूपी असुर का निग्रह नहीं होगा, तब तक साधना निष्फल रहेगी। अतः हे जीव! आडंबर त्याग, अंतर्मंदिर में दीप प्रज्वलित कर।

बाब कबीर का यह उद्घोष स्पष्ट है “आत्मा में स्थित परमज्योति को पहचानो।” जो अपने भीतर काशी, मथुरा और द्वारिका का साक्षात्कार कर लेता है, वही सच्चा साधक, वही मुक्त, वही धन्य कहलाता है।

कौशलेंद्र प्रियदर्शी की कलम से