Eid-ul-fitr 2026 : सिर्फ परंपरा नहीं, विज्ञान भी है ईद का आलिंगन, जानिए क्यों खास महसूस होता है इस दिन गले मिलना

Eid-ul-fitr 2026 : एक महीने के उपवास और चिंतन के बाद, ईद की गले लगने की अनुभूति महज़ अभिवादन से कहीं बढ़कर होती है.......पढ़िए आगे

Eid-ul-fitr 2026 : सिर्फ परंपरा नहीं, विज्ञान भी है ईद का आल
ईद का आलिंगन- फोटो : SOCIAL MEDIA

N4N DESK : ईद-उल-फितर का त्यौहार केवल पकवानों और खुशियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में 'ईद मिलन' और गले मिलने की वह परंपरा है जो सामान्य अभिवादन से कहीं अधिक गहरी महसूस होती है। मनोवैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का मानना है कि रमज़ान के एक महीने के कड़े अनुशासन के बाद जब दो व्यक्ति गले मिलते हैं, तो वह केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि एक गहन जैविक और भावनात्मक बदलाव का परिणाम होता है।

आध्यात्मिक अनुशासन से बदलती है सोच

मनोचिकित्सकों के मुताबिक रमज़ान के 30 दिनों तक धैर्य, सहानुभूति और आत्म-नियंत्रण का अभ्यास करने से मनुष्य की भावनात्मक प्रक्रिया में बदलाव आता है। उपवास और इबादत के जरिए लोग रिश्तों के प्रति अधिक जागरूक और संवेदनशील हो जाते हैं। यही कारण है कि ईद के दिन लोगों में एक-दूसरे से जुड़ने की इच्छा और खुलेपन का भाव चरम पर होता है।

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ऑक्सीटोसिन का प्रभाव: क्यों गहरा होता है अहसास?

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो गले मिलने की क्रिया शरीर में ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) नामक हार्मोन का स्राव करती है, जिसे 'बॉन्डिंग हार्मोन' भी कहा जाता है। डॉक्टर बताते हैं कि करुणा और आध्यात्मिकता पर केंद्रित एक महीने के बाद, यह हार्मोनल प्रतिक्रिया अधिक तीव्र हो जाती है। यह विश्वास, स्नेह और भावनात्मक निकटता को बढ़ावा देता है, जिससे ईद का आलिंगन सामान्य दिनों की तुलना में अधिक सार्थक और सुकून देने वाला लगता है।

साझा अनुभव और सामुदायिक सामंजस्य

रमज़ान एक सामूहिक यात्रा है—सहनी, इफ्तार, नमाज़ और ज़कात (दान) जैसी साझा दिनचर्या परिवारों और समुदायों को एक सूत्र में पिरोती है। मनोविज्ञान में इसे 'सामुदायिक सामंजस्य' (Community Cohesion) कहा जाता है। एक महीने की सामूहिक तपस्या के बाद जब लोग ईद पर मिलते हैं, तो वह आलिंगन एक सामूहिक उपलब्धि की स्वीकृति बन जाता है। यह अहसास दिलाता है कि "हमने यह यात्रा साथ पूरी की है।"

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महज शिष्टाचार नहीं, मौन अभिव्यक्ति

विशेषज्ञों का कहना है कि ईद पर गले मिलना सिर्फ एक सामाजिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि कृतज्ञता और अपनेपन की एक मौन अभिव्यक्ति है। आत्मचिंतन के दौर से गुजरने के बाद रिश्तों के प्रति सराहना बढ़ जाती है, जिससे अपनों से मिलना अधिक वास्तविक और आत्मीय अनुभव देता है। यही वजह है कि ईद की मुबारकबाद के साथ दिया गया वह एक आलिंगन दिलो-दिमाग पर लंबे समय तक अपनी छाप छोड़ जाता है।