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Bihar Dirty work Trafficking: खलीफा सिंडिकेट का काला खेल! कानून की आड़ में मासूमों के दोबारा गंदा काम के लिए करता है तस्करी, सीमांचल से नेपाल तक फैला गजब का जाल

Bihar Dirty work Trafficking:पूर्णिया, किशनगंज और सीतामढ़ी में सक्रिय कथित खलीफा सरनेम वाला आपराधिक सिंडिकेट मानव तस्करी और देह व्यापार के धंधे को बेहद शातिर अंदाज़ में अंजाम देने के आरोपों के कारण चर्चा में है।

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खलीफा सिंडिकेट का लड़कियों के गंदा काम का काला खेल!- फोटो : social Media

Bihar Dirty work Trafficking: बिहार के सीमांचल इलाके पूर्णिया, किशनगंज और सीतामढ़ी में सक्रिय कथित खलीफा सरनेम वाला आपराधिक सिंडिकेट मानव तस्करी और देह व्यापार के धंधे को बेहद शातिर अंदाज़ में अंजाम देने के आरोपों के कारण चर्चा में है। आरोप है कि यह गिरोह पहले प्रेम जाल, नौकरी और बेहतर जिंदगी का झांसा देकर नाबालिग लड़कियों को अपने चंगुल में फंसाता है। इसके बाद यदि पुलिस या सामाजिक संस्थाएं इन लड़कियों को रेड लाइट इलाकों से रेस्क्यू कर बालिका गृह भेजती हैं, तो सिंडिकेट कानूनी दांव-पेच और फर्जी दस्तावेजों के सहारे उन्हें दोबारा अपनी गिरफ्त में लेने की कोशिश करता है।

आरोपों के मुताबिक, गिरोह के सदस्य नकली अभिभावक, फर्जी निवास प्रमाणपत्र और जाली पहचान पत्र तैयार कर अदालत या संबंधित प्रक्रिया के जरिए बालिका गृह से लड़कियों की कस्टडी हासिल कर लेते हैं।

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 कस्टडी मिलने के बाद इन्हीं पीड़िताओं को फिर से देह व्यापार के अंधेरे धंधे में धकेल दिए जाने का दावा किया गया है। कई मामलों में कथित तौर पर वही नाम, वही गवाह और वही नेटवर्क बार-बार सामने आने की बात कही गई है।

पड़ताल में यह भी सामने आया कि वर्ष 2021 में पटना हाई कोर्ट ने हनीफ-उर-रहमान बनाम बिहार राज्य मामले में स्पष्ट निर्देश दिए थे कि किसी भी बच्चे की कस्टडी सौंपने से पहले सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट, स्वतंत्र सत्यापन, अभिभावकों की गहन जांच और बच्चे के सर्वोत्तम हितको प्राथमिकता दी जाए। वहीं किशोर न्याय अधिनियम (JJ Act) की धारा 94 के तहत उम्र निर्धारण के लिए मैट्रिक प्रमाणपत्र, जन्म प्रमाणपत्र या मेडिकल बोर्ड की जांच को मान्यता दी गई है। विभिन्न अदालतें यह भी स्पष्ट कर चुकी हैं कि आधार कार्ड उम्र निर्धारण का वैध कानूनी दस्तावेज नहीं है।

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जांच के दौरान ऐसे मामले भी सामने आए, जिनमें कथित तौर पर वार्ड पार्षद और सरपंच के लेटरहेड पर निवास और पहचान संबंधी प्रमाणपत्र जारी किए गए। एक मामले में वार्ड पार्षद के परिवार ने दावा किया कि संबंधित लड़की और उसके परिजनों को वे जानते तक नहीं थे। वहीं दूसरे मामले में जिस व्यक्ति को बच्ची का पिता बताकर दस्तावेज़ तैयार किए गए, उसने बाद में कहा कि उस समय वह जेल में बंद था।