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Bihar News: 9 महीने सलाखों के पीछे बेगुनाह, FSL रिपोर्ट ने खोली पुलिस की फर्जी बरामदगी की पोल, जांच में स्मैक नहीं -निकली दर्द-बुखार की दवा

Bihar News: एक युवक को स्मैक रखने के जुर्म में पुलिस ने गिरफ्तार कर अपना फीठ थपथपवाया तो वहीं एफएसएल जांच में सैंपल स्मैक नहीं बुखार की दवा निकली है।...

Muzaffarpur FSL Clears Men Jailed 9 Months Smack Was Just Me
स्मैक नहीं -निकली दर्द-बुखार की दवा- फोटो : reporter

Bihar News:बिहार पुलिस की कारगुजारी का फिर खुलासा हुआ है। एक युवक को स्मैक रखने के जुर्म में पुलिस ने गिरफ्तार कर अपना फीठ थपथपवाया तो वहीं एफएसएल जांच में सैंपल स्मैक नहीं बुखार की दवा निकली है।  मुजफ्फरपुर के बेनीबाद थाना की कार्रवाई पर उस वक्त बड़ा पर्दाफाश हुआ, जब फॉरेंसिक साइंस लैब  की रिपोर्ट ने पुलिस की पूरी कहानी को कटघरे में खड़ा कर दिया। जिस पदार्थ को पुलिस ने स्मैक बताकर तीन युवकों पर एनडीपीएस एक्ट जैसी संगीन धाराएं लगाईं और उन्हें करीब 9 महीने तक जेल की सलाखों के पीछे रखा, वह असल में दर्द और बुखार में इस्तेमाल होने वाली साधारण दवा निकली। इस खुलासे के बाद विशेष एनडीपीएस कोर्ट-2 ने तीनों आरोपियों को तत्काल बाइज्जत बरी कर दिया।

पूरा मामला 27 अक्टूबर 2025 का है। तत्कालीन बेनीबाद थानाध्यक्ष साकेत कुमार शार्दुल के आवेदन पर प्रेमसागर कुमार उर्फ छोटा बेला, सुभांश कुमार और राजेश कुमार के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। पुलिस ने दावा किया था कि पिरौछा गांव में छापेमारी के दौरान तीनों के पास से 30 पुड़िया कथित स्मैक बरामद हुईं। इतना ही नहीं, पुलिस ने यह भी कहा कि पूछताछ में आरोपियों ने नशे के कारोबार में शामिल होने की बात कबूल की थी। इसके बाद आनन-फानन में चार्जशीट दाखिल कर दी गई और तीनों को जेल भेज दिया गया।

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लेकिन जांच की असली तस्वीर तब सामने आई, जब गन्नीपुर और भोपाल स्थित एफएसएल की रिपोर्ट अदालत पहुंची। दोनों प्रयोगशालाओं ने साफ कर दिया कि जब्त सामग्री में स्मैक या कोई प्रतिबंधित मादक पदार्थ नहीं था। रिपोर्ट के अनुसार वह केवल डायक्लोफेनिक और निमेसुलाइड जैसी सामान्य दर्द निवारक और बुखार की दवाओं का मिश्रण था।

इस सनसनीखेज खुलासे ने पुलिस की तफ्तीश, जब्ती प्रक्रिया और विवेचना पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिना वैज्ञानिक पुष्टि के आखिर कैसे साधारण दवा को मादक पदार्थ घोषित कर दिया गया। इस कथित फर्जी बरामदगी की कीमत तीन बेगुनाह युवकों ने 9 महीने जेल में रहकर चुकाई। अब यह मामला सिर्फ एक गलत जांच नहीं, बल्कि पुलिस की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर बड़ा इल्जाम बनकर खड़ा हो गया है।

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रिपोर्ट-मणिभूषण शर्मा