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'भोजपुरी के शेक्सपियर' भिखारी ठाकुर के प्रपौत्र राजभवन से बर्खास्त: नियुक्ति से निष्कासन तक की पूरी दास्तान

महान पुरोधा 'भोजपुरी के शेक्सपियर' भिखारी ठाकुर के प्रपौत्र सुशील कुमार ठाकुर को बिहार राजभवन से बर्खास्त कर दिया गया है। पूर्व राज्यपाल द्वारा सम्मान स्वरूप दी गई इस नौकरी पर कार्यकुशलता और दक्षता परीक्षा में शामिल न होने के कारण गाज गिरी है।

Bhikhari Thakur Great-Grandson Terminated from rajbhavan job
भिखारी ठाकुर के प्रपौत्र की राजभवन से सेवा समाप्त: सम्मान से बर्खास्तगी तक का सफर- फोटो : news 4 nation

 'भोजपुरी के शेक्सपियर' और लोक संस्कृति के पुरोधा के रूप में विश्वविख्यात भिखारी ठाकुर के परिवार से जुड़ा एक बड़ा प्रशासनिक घटनाक्रम सामने आया है। बिहार के राजभवन सचिवालय ने महान लोक कलाकार के प्रपौत्र सुशील कुमार ठाकुर की सेवा तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी है। यह मामला जहां एक तरफ लोक कलाकारों के परिवारों को सम्मान देने की परंपरा से जुड़ा है, वहीं दूसरी तरफ यह प्रशासनिक नियमों, तकनीकी योग्यता और कार्यकुशलता की कसौटी को रेखांकित करता है। इस फैसले ने प्रशासनिक गलियारों में खासी चर्चा छेड़ दी है।

राज्यपाल की घोषणा से हुई थी शुरुआत: सम्मान के रूप में मिली थी राजभवन में नौकरी

इस पूरे मामले की पटकथा पिछले वर्ष सारण जिले के डोरीगंज स्थित कुतुबपुर दियारा से लिखी गई थी, जो भिखारी ठाकुर की जन्मस्थली है। बिहार के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. आरिफ मोहम्मद खान ने 18 दिसंबर 2025 को उनके गांव का दौरा कर परिजनों का हाल-चाल जाना था। महान कलाकार के अतुलनीय योगदान को सम्मान देने और परिवार को आर्थिक सहारा देने के उद्देश्य से उन्होंने प्रपौत्र सुशील कुमार ठाकुर को नौकरी देने का ऐलान किया। इसके बाद 23 जनवरी 2026 को आदेश जारी कर सुशील को राजभवन में आशुलिपिक (स्टेनोग्राफर) के पद पर परिवीक्षा (प्रोबेशन) पर नियुक्त किया गया था।

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तकनीकी अर्हता का अभाव: टाइपिंग और आशुलिपि ज्ञान पर उठे सवाल

नियुक्ति के महज कुछ महीनों भीतर ही सुशील कुमार की कार्यकुशलता पर सवाल खड़े होने लगे। राजभवन के अतिरिक्त मुख्य सचिव दीपक कुमार सिंह द्वारा जारी आदेश के अनुसार, बिहार सचिवालय स्टेनोग्राफर सेवा नियमावली के तहत इस पद के लिए शॉर्टहैंड और हिंदी/अंग्रेजी टाइपिंग का ज्ञान अनिवार्य है। अधिकारियों के साथ काम में संबद्ध किए जाने पर यह पाया गया कि सुशील के पास स्टेनोग्राफी का बुनियादी ज्ञान और अपेक्षित टाइपिंग स्पीड नहीं है, जिससे कार्य संचालन में काफी बाधा आ रही थी।

दक्षता परीक्षा से लगातार दूरी: दो-दो मौकों के बावजूद अनुपस्थित रहे सुशील

कर्मचारियों के कौशल मूल्यांकन हेतु गठित तीन सदस्यीय समिति के निर्देश पर 22 जुलाई 2026 को दक्षता परीक्षा आयोजित की गई, लेकिन सुशील इसमें शामिल नहीं हुए। उनका तर्क था कि ऐसी परीक्षा नियुक्ति से पहले होनी चाहिए थी। इसके बाद राजभवन ने संवेदनशीलता दिखाते हुए 6 अगस्त 2026 को परीक्षा में शामिल होने का एक अंतिम मौका और दिया। इसके बावजूद वह पुनः अनुपस्थित रहे और परीक्षा से छूट की मांग पर अड़े रहे। प्रशासन ने इसे स्पष्ट रूप से आदेश की अवहेलना और अनुशासनहीनता माना।

कानूनी प्रावधान और परिवीक्षा नियम: सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया गया हवाला

राजभवन द्वारा जारी निष्कासन पत्र में 'बिहार सरकारी सेवक परिवीक्षा अवधि नियम- 2024' और सर्वोच्च न्यायालय के प्रसिद्ध फैसले 'पुरुषोत्तम लाल ढींगरा बनाम भारत संघ' का हवाला दिया गया। इसके तहत यह स्पष्ट किया गया है कि एक वर्ष से कम की प्रोबेशन अवधि के दौरान यदि किसी कर्मचारी का कार्य संतोषजनक नहीं पाया जाता है या वह विभागीय निर्देशों का उल्लंघन करता है, तो बिना किसी लंबी जांच के उसकी सेवा समाप्त की जा सकती है। इसी आधार पर सक्षम प्राधिकार ने उनकी बर्खास्तगी का निर्णय लिया।

कौन थे 'भोजपुरी के शेक्सपियर': कला का सम्मान बनाम प्रशासनिक अनुशासन

भिखारी ठाकुर (1887–1971) भोजपुरी भाषा और लोक संस्कृति के निर्विवाद सिरमौर रहे हैं। अपनी नाटकों और रचनाओं जैसे 'बिदेसिया', 'गबरघिचोर', 'बेटी बेचवा' और 'विधवा विलाप' के माध्यम से उन्होंने सामाजिक कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया। उनके प्रपौत्र की यह नियुक्ति लोक कला और विरासत के प्रति आदर भाव का परिणाम थी। हालांकि, प्रशासनिक नियमों, दक्षता की अनिवार्यता और कानूनी मर्यादा के कारण इस संवेदनशील पहल का अंत बर्खास्तगी के साथ हुआ।

सारण से धर्मेन्द्र रस्तोगी की रिपोर्ट