‘बिहार-गीत’ के रचनाकार कवि-शिरोमणि सत्यनारायण के निधन पर सीएम सम्राट चौधरी ने जताया शोक, 'मेरे भारत के कंठहार' से बढ़ाया मान
सत्यनारायण बिहार गीत 'मेरे भारत के कंठहार' के रचयिता थे। वर्ष 2012 में बिहार के शताब्दी वर्ष के अवसर पर रचा गया यह गीत बिहार की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। उन्होंने नालंदा खुला विश्वविद्यालय के कुलगीत की भी रचना की थी।

Satyanarayan author of Bihar-Geet : बिहार के साहित्यिक और सांस्कृतिक जगत के लोकप्रिय चेहरे कवि-शिरोमणि सत्यनारायण के निधन पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने शुक्रवार को गहरी शोक संवेदना व्यक्त की। उन्होंने कहा, '‘बिहार-गीत’ के अमर रचनाकार एवं बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के पूर्व उपाध्यक्ष, कवि-शिरोमणि श्री सत्यनारायण जी के निधन का समाचार अत्यंत दुःखद एवं हृदयविदारक है। उनकी अंत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ की जाएगी। श्री सत्यनारायण जी ने अपनी साहित्यिक साधना और कालजयी रचनाओं के माध्यम से बिहार की माटी, संस्कृति और गौरव को स्वर एवं शब्द प्रदान किए। उनका निधन बिहार के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा शोकाकुल परिजनों, साहित्यप्रेमियों एवं उनके असंख्य प्रशंसकों को इस अपार दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करें।'
दरअसल, वर्ष 1974 के जेपी आंदोलन के दौरान नुक्कड़ कविता पाठ के जरिए अपनी अलग पहचान बनाने वाले वरिष्ठ कवि-गीतकार सत्यनारायण का निधन हो गया। उन्होंने 27 अगस्त की देर रात कदमकुआं स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। वे 92 वर्ष के थे। उनके इंतकाल की खबर फैलते ही साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई। सत्यनारायण सिर्फ कवि और गीतकार नहीं थे, बल्कि जनभावनाओं और सामाजिक सरोकारों को अपनी रचनाओं में आवाज देने वाले संवेदनशील रचनाकार के तौर पर उनकी अलग पहचान थी। उनके गीतों और कविताओं में आम आदमी की पीड़ा, समाज की हलचल और मानवीय संवेदनाओं की गहरी झलक दिखाई देती थी।
‘मेरे भारत के कंठहार’ ने दिलाई अलग पहचान
सत्यनारायण की सबसे चर्चित रचनाओं में बिहार गीत ‘मेरे भारत के कंठहार’ शामिल है। वर्ष 2012 में बिहार के शताब्दी वर्ष के अवसर पर रचा गया यह गीत धीरे-धीरे बिहार की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बन गया। गीत के जरिए उन्होंने बिहार की मिट्टी, विरासत और सांस्कृतिक गौरव को शब्दों में पिरोया।इसके अलावा उन्होंने नालंदा खुला विश्वविद्यालय के कुलगीत की भी रचना की थी। उनकी साहित्यिक यात्रा गीत, नवगीत और कविता की विभिन्न धाराओं से होकर गुजरी। लंबे साहित्यिक जीवन में उन्होंने हिंदी साहित्य को अपनी रचनाधर्मिता से समृद्ध किया।
जेपी आंदोलन में नुक्कड़ कविता बनी पहचान
वर्ष 1974 में जब बिहार में जेपी आंदोलन ने व्यापक जनांदोलन का रूप लिया, तब सत्यनारायण नुक्कड़ कविता पाठ के जरिए लोगों के बीच पहुंचे। उनकी कविताएं सिर्फ कागज तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि सड़कों और चौक-चौराहों तक पहुंचीं।उनकी रचनाओं में जनभावना और सामाजिक चेतना की ऐसी रवानी थी, जिसने उन्हें आंदोलन के दौर में अलग पहचान दिलाई। कविता को जनसंवाद का माध्यम बनाने वाले सत्यनारायण की आवाज लंबे समय तक साहित्य और समाज में गूंजती रही।
साहित्य जगत ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि
सत्यनारायण के निधन पर संझाबाती पत्रिका के संपादक कवि-कथाकार हेमंत कुमार ने गहरा दुख जताया। उन्होंने कहा कि सत्यनारायण के निधन से हिंदी साहित्य को अपूरणीय क्षति हुई है और काव्य-जगत को गहरा सदमा पहुंचा है।हेमंत कुमार ने उन्हें ‘संवेदना के स्वर का अनुपम गायक’ बताते हुए कहा कि वह सदा के लिए चिरनिद्रा में सो गए। उनके मुताबिक सत्यनारायण बिहार हिंदी प्रगति समिति के अध्यक्ष और बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के उपाध्यक्ष भी रहे। उन्होंने गीत, नवगीत और कविता की पावन त्रिवेणी के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
नागार्जुन और भारतेन्दु सम्मान से नवाजे गए
साहित्य में उनके योगदान को सरकारों ने भी सम्मान दिया। बिहार सरकार ने उन्हें नागार्जुन सम्मान (2020-21) से सम्मानित किया था। वहीं भारत सरकार की ओर से वर्ष 2023 में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार प्रदान किया गया।सत्यनारायण का जाना बिहार की साहित्यिक विरासत के लिए एक बड़ी क्षति है। जेपी आंदोलन के दौर में नुक्कड़ पर गूंजती उनकी कविता से लेकर ‘मेरे भारत के कंठहार’ जैसे गीत तक, उनकी रचनाएं आने वाली पीढ़ियों को उनकी साहित्यिक मौजूदगी का एहसास कराती रहेंगी।















