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Bihar News: आजादी के 78 साल बाद भी निकल रहा है बिहार में विकास का जनाजा! जीते जी नसीब नहीं हुई सड़क, मौत के बाद भी तैरती रही अर्थी, सुशासन को झकझोरने वाली खौफनाक तस्वीर आप खुद देख लीजिए

Bihar News:आजादी के 78 साल बाद भी बिहार में इंसान की जिंदगी की कौन कहे मौत के बाद की तस्वीर सरकार के गुरूर को खाक में मिला देने के लिए काफी हैं।...

No Bridge Even in Death Villagers Carry Bier Across River
तस्वीर देख कलेजा फट जाएगा- फोटो : reporter

Bihar News:कहाँ तो तय था चरागां हर एक घर के लिए, कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए। दुष्यंत कुमार की ये लाइन कटिहार के फलका के लोगों पर सटीक बैठती है।  इंसान की जिंदगी में कुछ सवाल ऐसे होते हैं जो हुकूमतों के गुरूर को खाक में मिला देते हैं। विकास के लंबे-चौड़े कसीदे और डिजिटल इंडिया के शोर के बीच कटिहार के फलका प्रखंड अंतर्गत मोरसंडा गांव से जो रूह को कंपा देने वाला मंजर सामने आया है, उसने इंसानियत का सिर शर्म से झुका दिया है। यहाँ एक बदनसीब इंसान,अरविंद मंडल, को जीते जी तो गांव की बदहाली से निजात नहीं मिली,लेकिन मरने के बाद भी उसकी मय्यत को बेइंतहा जिल्लत झेलनी पड़ी। अपनों की मौत के गम में डूबे गांववाले जब रोते-बिलखते कंधे पर अर्थी लेकर निकले, तो रास्ते में खड़ी उफनती कमला नदी ने उनका रास्ता रोक दिया। पुल न होने के कारण मजबूर ग्रामीणों को जान जोखिम में डालकर,अर्थी को कंधे पर उठाए, लगभग तैरते हुए इस पार से उस पार जाना पड़ा।


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नेताओं की चौखट और वोट का खेल

यह दर्द, यह बेबसी कोई नई नहीं है। इस इलाके की लाचार लोग बरसों से इस त्रासदी को अपनी तकदीर मानकर जी रही है। विडंबना देखिए कि लोकसभा क्षेत्र के लिहाज से यह इलाका पूर्णिया में आता है और विधानसभा के नक्शे पर कटिहार के कोढ़ा में। दो-दो बड़े राजनीतिक कद्दावरों के क्षेत्रों से जुड़े होने के बावजूद इस बड़ी आबादी के हिस्से सिर्फ और सिर्फ चुनावी वादे आए।बाढ़ के खौफनाक दिनों में जब नदी का पानी उफान पर होता है, तो लाचार ग्रामीण अपनी गाढ़ी कमाई से आपसी चंदा करके बांस का चचरी पुल बनाते हैं। आज जब पानी कम है, तो जिंदगी की जद्दोजहद और रोजाना के कामकाज के लिए बूढ़े, बच्चे और औरतें इसी तरह पानी हेलकर सफर तय करने को मजबूर हैं। सरकारी मदद के नाम पर यहाँ सन्नाटा पसरा है। एक निजी नाव चलती भी है, तो उस पर इस कदर ओवरलोडिंग होती है कि लोग खौफ के मारे उस मौत के सफर से तौबा कर चुके हैं।

विधायक का कागजी सबूत और सिस्टम की बेरुखी

इस दिल दुखाने वाले, आत्मा को झकझोर देने वाले वीडियो के वायरल होने के बाद स्थानीय भाजपा विधायक कविता पासवान ने हमेशा की तरह अपनी संवेदनशीलता का कागजी सबूत पेश किया है। उन्होंने विधानसभा में आवाज उठाने का वीडियो दिखाते हुए दावा किया कि जिला स्तर से प्लानिंग में हुई कुछ तकनीकी गड़बड़ी की वजह से यह पुल नहीं बन पाया। उन्होंने दोबारा नया वादा किया है कि जल्द ही काम शुरू कराया जाएगा। जब तक नेताजी की फाइलें दफ्तरों के चक्कर काटेंगी, तब तक और कितनी अर्थियों को इस तरह नदी में तैरना होगा?

सरकार के विकासवाद को सबसे बड़ी चुनौती


दावा है कि बिहार में सड़कों और पुल-पुलियों का जाल बिछ चुका है और सूबा तरक्की की नई रफ्तार पकड़ रहा है। लेकिन कटिहार की यह बेबस तस्वीर नीति-नियंताओं के तमाम दावों का कत्ल कर रही है। कंधों पर इंसाफ की उम्मीद और पानी में तैरती अर्थी की यह खौफनाक दास्तान सूबे के नुमाइंदों से पूछ रही है कि आखिर इस अवाम का कसूर क्या है? यह तस्वीर सरकार की विकासवाद वाली सोच के मुंह पर एक करारा तमाचा नहीं है क्या?

रिपोर्ट- श्याम कुमार सिंह