LATEST NEWS

  • DM Kumar Gaurav Balances Navratri Duty and Devotion
  • Bihar News:मुजफ्फरपुर में सुरक्षा की कमान भी, मां की भक्ति भी, DM कुमार गौरव ने परिवार संग मां

  • Patna Ravan Dahan
  • Patna Ravan Dahan:पटना में रावण दहन से पहले हाई अलर्ट, गांधी मैदान में हो रही सघन जांच

  • Bihar News: कन्या पूजन के दिन झाड़ियों में फेंकी गई नवजात कन्या,थानेदार ने दिखाई इंसानियत, गोद में उठाकर पहुंचाया अस्पताल
  • Bihar News: कन्या पूजन के दिन झाड़ियों में फेंकी गई नवजात कन्या,थानेदार ने दिखाई इंसानियत, गोद में उठाकर

  • Bihar News: बक्सर में मां दुर्गा के दिव्य रूपों की जीवंत झांकी, ज्ञान गंगा के संदेश ने मोहा श्रद्धालुओं का मन
  • Bihar News: बक्सर में मां दुर्गा के दिव्य रूपों की जीवंत झांकी, ज्ञान गंगा के संदेश ने मोहा

  • Bihar Education Minister Mithilesh Tiwari
  • Bihar News: महानवमी पर मां विंध्यवासिनी के दरबार पहुंचे शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी, बिहार की खुशहाली के लिए

Pitru Paksha Mela: आज अकाल मृत्यु प्राप्त पितरों को प्रेतयोनि से शाश्वत मोक्ष के लिए पिंडदान, इन चार वेदियों पर होता है परम अनुष्ठान, पढ़िए विष्णुनगरी का पारलौकिक और आदि-अनादि माहात्म्य

Pitru Paksha Mela: पितृपक्ष की इस विशिष्ट तिथि, जिसे आश्विन कृष्ण प्रतिपदा कहा जाता है, पर पिंडदान करने का सर्वाधिक महत्व अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए परिजनों की आत्मा की परम शांति से जुड़ा है।

Pitru Paksha Mela
आज अकाल मृत्यु प्राप्त पितरों को प्रेतयोनि से शाश्वत मोक्ष के लिए पिंडदान- फोटो : X

Pitru Paksha Mela: सनातन धर्म में मोक्षदायिनी विष्णुनगरी गयाजी का इतिहास आदि-अनादि काल से गुंथा हुआ है। पुराणों एवं धर्मशास्त्रों में यह स्पष्ट रूप से वर्णित है कि स्वयं पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु इस पावन धरा पर सूक्ष्म रूप में सदैव निवास करते हैं। इसी पुण्यतोया भूमि पर आयोजित होने वाले विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेले के तृतीय दिवस का अत्यंत विशिष्ट एवं पारलौकिक माहात्म्य है। इस दिन गयाजी की चार विभिन्न और पवित्र वेदियों पर पिंडदान करने का शास्त्रीय विधान है। मान्यता है कि इन निर्दिष्ट वेदियों पर पूर्ण अंतःकरण एवं भक्ति-भाव से पिंडदान करने से प्रेतलोक की असीम यातनाएं भोग रहे पितरों को सर्वदा के लिए मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है और इसके पुण्य प्रभाव से वे सीधे ब्रह्मलोक को प्रस्थान कर जाते हैं।

अकाल मृत्यु से प्राप्त प्रेतयोनि से मुक्ति का परम अनुष्ठान

पितृपक्ष की आज की इस विशिष्ट तिथि, जिसे आश्विन कृष्ण प्रतिपदा कहा जाता है, पर पिंडदान करने का सर्वाधिक महत्व अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए परिजनों की आत्मा की परम शांति से जुड़ा है। शास्त्रोक्त मान्यताओं के अनुसार, अस्वाभाविक मृत्यु जैसे भयंकर मार्ग दुर्घटना, जल में डूबना ), अग्नि-दाह, हत्या, आत्महत्या अथवा विष-पान के कारण शरीर त्यागने वाले पूर्वज प्रायः लौकिक आसक्ति के कारण प्रेतयोनि में भटकते रहते हैं। पितृपक्ष मेले  के तीसरे दिन का अनुष्ठान विशेष रूप से इन्हीं अतृप्त आत्माओं को प्रेतयोनि की असीम पीड़ा से मुक्ति दिलाने हेतु किया जाता है। इस पावन तिथि को आटे एवं चावल से निर्मित पिंडों का दान करने से उन्हें इस कष्टदायी योनि से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाती है। सनातन संस्कृति में शरीर नश्वर है, किंतु आत्मा अजर-अमर है। गया तीर्थ में किया गया यह शास्त्रोक्त अनुष्ठान आत्मा के सांसारिक पाश को काटने का एक दिव्य माध्यम है।

त्रेतायुग की परंपरा और ब्रह्मकुंड में स्नान का विधान

त्रेतायुग के पौराणिक प्रसंगों का अध्ययन करें, तो ज्ञात होता है कि जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम स्वयं गयाजी धाम पधारे थे, तब उन्होंने भी सर्वप्रथम इसी पवित्र ब्रह्मकुंड सरोवर में स्नान किया था। तत्पश्चात भगवान श्रीराम ने प्रेतशिला सहित अन्य पिंडवेदियों पर अपने पूर्वजों का श्राद्ध कर्म पूर्ण विधि-विधान से संपन्न किया था।

आज भी उसी सनातन परंपरा का अक्षुण्ण निर्वहन करते हुए, इस दिन पिंडदान के शुभारंभ से पूर्व पवित्र ब्रह्मकुंड सरोवर में स्नान करना प्रत्येक तीर्थयात्री के लिए अनिवार्य माना जाता है। यह दिव्य सरोवर साक्षात सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा के आशीर्वाद से उद्गमित है। ब्रह्मकुंड में स्नान एवं तर्पण की प्रक्रिया पूर्ण करने के उपरांत ही श्रद्धालु मुख्य वेदियों पर पिंडदान हेतु अग्रसर होते हैं।

NSIT
Nsmch

चार प्रमुख वेदियों पर श्राद्ध और वायु पुराण का उल्लेख

आश्विन कृष्ण प्रतिपदा की इस पावन तिथि को मुख्य रूप से चार वेदियों -प्रेतशिला, रामकुंड, रामशिला एवं काकबली-पर पिंडदान करने का अचूक और परम फलदायी विधान है। इन चारों निर्दिष्ट वेदियों पर क्रमानुसार तिल, कुशा, यव (जौ), जल और अक्षत से श्राद्ध कर्म एवं तर्पण संपन्न करने से भटकती हुई आत्माओं के त्रिविध ताप सर्वदा के लिए नष्ट हो जाते हैं।

इन वेदियों पर किए जाने वाले श्राद्ध का विस्तृत माहात्म्य वायु पुराण सहित विभिन्न सनातन धर्मशास्त्रों में सविस्तार वर्णित है। ऐसी अटूट मान्यता है कि जिस प्रकार भगवान विष्णु सभी प्रकार के यज्ञों की पूर्णता सुनिश्चित करते हैं, ठीक उसी प्रकार गयाजी धाम में किया गया यह सकाम श्राद्ध, पिंडदान करने वाले कर्ता को अनंत और अक्षयफल प्रदान करता है।

श्रद्धा, भक्ति और तीर्थयात्रियों के जनसैलाब से आच्छादित गयाजी

वर्तमान समय में पितृपक्ष मेले के दौरान गयाजी का परिदृश्य अत्यंत अलौकिक और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत प्रतीत हो रहा है। सर्वत्र केवल पिंडदानी एवं श्रद्धालु ही दृष्टिगोचर हो रहे हैं। सभी तीर्थयात्री पूर्ण आस्था के साथ अपने पितरों तथा पूर्वजों को शाश्वत मोक्ष दिलाने के निमित्त, वैदिक ब्राह्मणों के दिशा-निर्देशन में कर्मकांड संपन्न कर रहे हैं।

प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, पितृपक्ष मेले के दूसरे दिन तक ही इस मोक्षदायिनी विष्णुनगरी में दो लाख से अधिक पुण्यात्मा तीर्थयात्री पधार चुके हैं। संपूर्ण गयाजी धाम देश-देशांतर से आए श्रद्धालुओं के अपार जनसमूह, वैदिक मंत्रोच्चार की गूंज और पितृ-भक्ति के अद्भुत संगम से पूरी तरह आच्छादित हो चुका है, जो सनातन धर्म की जीवंतता का सबसे प्रबल प्रमाण है।

हीरेश कुमार