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Bihar Colors Customs: रंग, रिवायत और रहस्य, क्यों नई नवेली दुल्हन की पहली होली ससुराल में नहीं होती? जानिए आखिर क्यों?

Bihar Colors Customs: नई नवेली दुल्हन अपनी पहली होली ससुराल में नहीं मनाती, बल्कि मायके में ही यह त्योहार अदा करती है।....

Colors Customs  Mystery Why Brides Skip First Holi at In Law
क्यों नई नवेली दुल्हन की पहली होली ससुराल में नहीं होती?- फोटो : reporter

Bihar Colors Customs: फाल्गुन की फिज़ाओं में जब अबीर-गुलाल उड़ता है, ढोलक की थाप पर ठुमकती है दुनिया और हर दिल में मोहब्बत की रवानी बहती है, तब आता है रंगों का जश्न- होली। हिंदू धर्म का यह अहम त्योहार खुशियों, भाईचारे और नई शुरुआत का पैगाम देता है। हर साल फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन और उसके अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है। इस वर्ष चंद्र ग्रहण की वजह से कई जगह होलिका दहन सोमवार रात और कुछ स्थानों पर मंगलवार को हुआ, जबकि रंगों की बरसात बुधवार को देखने को मिली।

लेकिन इन रौनकों और रिवायतों के बीच एक दिलचस्प परंपरा सदियों से चली आ रही है नई नवेली दुल्हन अपनी पहली होली ससुराल में नहीं मनाती, बल्कि मायके में ही यह त्योहार अदा करती है। आखिर क्यों? इसके पीछे क्या पौराणिक मान्यता है?

गांव के बुजुर्गों की मानें तो कथा होलिका से जुड़ी है। मान्यता है कि होलिका अग्नि में बैठी और अगले ही दिन उसका विवाह होना था। जब उसकी होने वाली सास बारात लेकर पहुंची, तो चिता जलती देख स्तब्ध रह गई। तभी से यह परंपरा शुरू हुई कि नई बहू अपनी पहली होली ससुराल में न देखे। कहा जाता है कि पहली होली पर सास और बहू का साथ में होलिका दहन देखना रिश्तों में तल्ख़ी ला सकता है। इसलिए एहतियातन नवविवाहिता को मायके भेज दिया जाता है, ताकि रिश्तों में मिठास और बरकत बनी रहे।

दरभंगा जिले के जखरा गांव में मायके आई श्रेता कुमारी बताती हैं, “रिवाज है तो निभाना फर्ज़ है। बचपन की गलियों में होली खेलने का जो सुकून है, वह कहीं और नहीं। यहां सहेलियां, बहनें और रिश्तेदार सब मिलकर रंग लगाते हैं। जब गुलाल से दिल नहीं भरता, तो कीचड़ और गोबर से भी मस्ती कर लेते हैं। यही तो असली होली है—बेपरवाह, बेबाक और बेमिसाल।”

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उनके पति निलेश कुमार हंसते हुए कहते हैं, “ससुराल की होली के किस्से बहुत सुने थे। इस बार छुट्टी लेकर आया हूं। शालियों ने पहले रंग लगाया, फिर कीचड़ से सराबोर कर दिया। लेकिन मज़ा भी खूब आया। पकवान, गुजिया, मालपुआ सबका स्वाद ही अलग है।”

श्रेता की मां चुनचुन देवी कहती हैं, “परंपरा के मुताबिक बेटी की पहली होली मायके में ही होती है। हमने समधन से कहा और बेटी-दामाद को बुला लिया। घर में रौनक है, पकवान बन रहे हैं, आंगन में हंसी-खुशी गूंज रही है।”

होली सिर्फ रंगों का खेल नहीं, बल्कि रिश्तों की नज़ाकत और अपनत्व की नुमाइश भी है। यह त्योहार जहां पुराने गिले-शिकवे मिटाता है, वहीं नई दुल्हन की पहली होली मायके में मनाने की रिवायत रिश्तों को समय देने और समझदारी से निभाने का पैगाम देती है।रंगों की इस जश्न-ए-बहार में परंपरा और प्यार का ऐसा संगम है, जो हर साल दिलों को फिर से जोड़ देता है यही है होली की असली रूह। 

रिपोर्ट- वरुण कुमार ठाकुर