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Bihar News : LNMU में टेंडर का खेल, सालों से बिना टेंडर चल रहे कैंटीन और कॉफी हाउस, राजस्व को लग रहा चूना

Bihar News : ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा में बिना टेंडर के कैंटीन और कॉफी हाउस चल रहा है. जिससे राजस्व को चुना लग रहा है........पढ़िए आगे

Bihar News : LNMU में टेंडर का खेल, सालों से बिना टेंडर चल र
राजस्व की हानि - फोटो : SOCIAL MEDIA

Darbhanga : ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय (LNMU) एक बार फिर विवादों के घेरे में है। विश्वविद्यालय परिसर में संचालित कैंटीन और कॉफी हाउस को लेकर गंभीर अनियमितताओं की खबरें सामने आई हैं। आरोप है कि पिछले कई वर्षों से इन व्यावसायिक इकाइयों का संचालन बिना किसी वैध टेंडर प्रक्रिया के किया जा रहा है। इस अव्यवस्था के कारण विश्वविद्यालय को मिलने वाले मोटा राजस्व की भारी हानि हो रही है, जिससे प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

विश्वविद्यालय कैंपस के भीतर स्थित एक कैंटीन और एक कॉफी हाउस को लेकर लंबे समय से 'मिलीभगत' के आरोप लगते आ रहे हैं। स्थानीय छात्र संगठनों का दावा है कि विश्वविद्यालय प्रशासन के कुछ अधिकारियों के साथ सांठगांठ कर इन दुकानों को चलाया जा रहा है। विशेष रूप से कॉफी हाउस के बारे में यह कहा जा रहा है कि इसे पिछले कई वर्षों से बिना टेंडर प्रक्रिया अपनाए, केवल आपसी रजामंदी से आगे बढ़ाया जा रहा है, जो सरकारी नियमों का सीधा उल्लंघन है।

इस मुद्दे को लेकर विभिन्न छात्र संगठनों में भारी आक्रोश है। छात्र नेताओं ने इस संबंध में कई बार विश्वविद्यालय प्रशासन को लिखित आवेदन सौंपे हैं और धरना-प्रदर्शन भी किया है। छात्रों का स्पष्ट कहना है कि यदि इन दुकानों का विधिवत टेंडर निकाला जाए, तो विश्वविद्यालय के फंड में अच्छी-खासी राशि जमा हो सकती है। बिना टेंडर के संचालन को छात्र सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और चहेतों को लाभ पहुंचाने की कोशिश मान रहे हैं।

मामले की गंभीरता को देखते हुए जब विश्वविद्यालय के स्टेट अफसर कामेश्वर पासवान से सवाल किया गया, तो उन्होंने सफाई देते हुए स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की। उन्होंने बताया कि कैंटीन में वर्तमान में जीर्णोद्धार (Renovation) का काम चल रहा है, जिसके कारण कुछ प्रक्रियाएं प्रभावित हुई हैं। वहीं कॉफी हाउस के संचालन को लेकर उन्होंने आश्वासन दिया कि जल्द ही इसके लिए पारदर्शी तरीके से नए टेंडर की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

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हालांकि, प्रशासन के इन आश्वासनों से छात्र संतुष्ट नजर नहीं आ रहे हैं। जानकारों का कहना है कि जब तक टेंडर की प्रक्रिया सार्वजनिक नहीं होती और राजस्व की क्षति का आकलन नहीं किया जाता, तब तक विश्वविद्यालय की छवि पर लगे दाग साफ नहीं होंगे। अब देखना यह है कि प्रशासन कब तक इन दावों को धरातल पर उतारता है और परिसर में चल रहे इस "अवैध" कारोबार पर लगाम लगाता है। 

वरुण ठाकुर की रिपोर्ट