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सियासत की रंगीनियों के बीच तड़पता एक इंसान, क्या लोकतंत्र की फसल में गरीब की जिंदगी की कोई कीमत नहीं? जानकर रो देंगे आप

Bihar News: औरंगाबाद के गोह थानाक्षेत्र के बीरका गांव में एक बदनसीब रविदास की दास्तान किसी कयामत से कम नहीं है।

A human being suffers amidst the glitz and glamour of politi
सियसत की रंगीनियों के बीच तड़पता एक इंसान- फोटो : reporter

Bihar News: आज बिहार की फिज़ाओं में राजनीतिक सरगर्मी का सुरुर चढ़ा है। सत्ता के गलियारों में जोड़-तोड़, कुर्सी की खींचतान और नए समीकरणों का शोर है। बड़े-बड़े नेता दिल्ली दरबार की ओर नजर गड़ाए बैठे हैं। लेकिन, इस चकाचौंध के पीछे एक ऐसी हकीकत दम तोड़ रही है, जिसे देखकर इंसानियत भी शर्मसार हो जाए।

औरंगाबाद के गोह थानाक्षेत्र के बीरका गांव में एक बदनसीब रविदास की दास्तान किसी कयामत से कम नहीं है। जयपुर की तपती धूप में मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार का पेट पालने वाले 40 वर्षीय रविदास को क्या पता था कि उसकी मुफलिसी ही उसके लिए काल बनकर आएगी। आठ महीने पहले जब उसे पता चला कि उसके मुँह में कैंसर जैसी घातक बीमारी ने दस्तक दी है, तो मानो पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

जयपुर के डॉक्टरों ने इलाज के लिए 20 से 30 लाख रुपये का खर्च बताया, जो एक मजदूर के लिए किसी हिमालय को लांघने जैसा था। बेबसी और लाचारी के साये में, घर लौटकर उसने स्थानीय होम्योपैथी का सहारा लिया, लेकिन मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की। आज आलम यह है कि कैंसर ने अपना खौफनाक चेहरा दिखा दिया है मुँह में कीड़े पड़ गए हैं और दर्द इतना असहनीय है कि शायद मौत भी उससे बेहतर मालूम होती हो।

झारखंड में तैनात आईएएस अधिकारी राजेश सिंह ने मानवीय आधार पर थोड़ी मदद जरूर भेजी है, लेकिन वह समुद्र में एक बूंद के समान है। इधर, रविदास का 10 साल का मासूम बेटा जब अपने पिता की बदहाली देखता है, तो उसकी आँखों से जो आँसू गिरते हैं, वे सियसत के हर उस चेहरे पर तमाचा हैं जो विकास का ढिंढोरा पीटते हैं।

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रविदास जब भी अपने बेटे का चेहरा देखता है, तो नियति को कोसता है। वह सोचता है कि उसने कौन सा गुनाह किया था कि वह गरीब पैदा हुआ? क्या इस लोकतंत्र में एक गरीब की जान की कोई कीमत नहीं? क्या सत्ता की इस बिसात पर इंसानी जिंदगी सिर्फ एक मोहरा है?

बिहार की इस राजनीतिक गहमागहमी के बीच, यह सवाल अब हर संवेदनशील इंसान के दिल को झकझोर रहा है कि आखिर कब तक मुफलिसी का यह कफन गरीबों को जिंदा ओढ़ना पड़ेगा? आपको लगता है कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था में गरीबों के लिए वास्तव में कोई जगह बची है, या हम केवल राजनीति के शोर में खो गए हैं?जवाब आप खुद देंगे...

रिपोर्ट- धीरेंद्र कुमार