UGC के नए नियमों पर आज सुप्रीम कोर्ट में होगी सुनवाई, आज कोर्ट तय करेगा क्या सही क्या गलत

UGC New Guidelines: सुप्रीम कोर्ट में CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली संवैधानिक पीठ आज UGC द्वारा प्रतिपादित नवीन भेदभाव-निरोधक विनियमों की वैधता एवं प्रासंगिकता पर सुनवाई करेगी।...

Supreme Court to hear UGC rules today
UGC के नए नियमों पर आज सुप्रीम कोर्ट में होगी सुनवाई- फोटो : X

UGC New Guidelines: देश की उच्चशिक्षा व्यवस्था में समता, न्याय एवं सामाजिक समरसता के प्रश्न पर आज एक ऐतिहासिक निर्णायक क्षण उपस्थित हो गया है। सुप्रीम कोर्ट में CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली संवैधानिक पीठ आज UGC द्वारा प्रतिपादित नवीन भेदभाव-निरोधक विनियमों की वैधता एवं प्रासंगिकता पर सुनवाई करेगी। यह सुनवाई केवल विधिक परीक्षण नहीं, अपितु राष्ट्र की सामाजिक संरचना एवं शैक्षिक नीति के मूलाधारों की पुनर्समीक्षा का भी संकेत दे रही है।

पूर्ववर्ती सुनवाई में न्यायालय ने अत्यंत कठोर और स्पष्ट अभिव्यक्ति में यह संकेत दिया था कि यदि इन नियमों की वर्तमान संरचना में यथोचित संशोधन नहीं किया गया, तो इसके दुष्परिणाम भयंकर हो सकते हैं। न्यायालय ने आशंका व्यक्त की थी कि यह विनियमन सामाजिक विखंडन एवं वैमनस्य को प्रोत्साहित कर सकता है, जिससे राष्ट्र की एकात्मता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

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केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को 19 मार्च तक अपना पक्ष स्पष्ट करने का निर्देश प्रदान किया गया है। न्यायालय ने कहा था कि  विषय की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए 2-3 प्रबुद्ध विशेषज्ञों की एक स्वतंत्र समिति गठित की जाए, जो सामाजिक यथार्थ एवं शिक्षण संस्थानों के व्यावहारिक परिवेश का सम्यक्‌ मूल्यांकन कर सके। यदि न्यायालय इस प्रस्तुतीकरण से संतुष्ट नहीं हुआ, तो इन विनियमों में व्यापक संशोधन अथवा पूर्ण पुनर्रचना की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता।

विवाद का मूल बिंदु इन नियमों की परिभाषात्मक संरचना में निहित है। नवीन विनियमों में भेदभाव की अवधारणा को मुख्यतः अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित किया गया है। याचिकाकर्ताओं ने इस संकीर्ण परिभाषा पर गंभीर आपत्ति व्यक्त करते हुए प्रश्न उठाया है कि क्या तथाकथित सामान्य वर्ग के छात्र भेदभाव के अनुभव से पूर्णतः विमुक्त हैं? न्यायालय ने भी इस दृष्टिकोण को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कहा है कि यह परिभाषा अपूर्ण एवं पुनर्विचार योग्य है।

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न्यायालय ने अपने पूर्वादेश में इन नियमों के क्रियान्वयन पर स्थगनादेश जारी करते हुए वर्ष 2012 के पूर्ववर्ती विधिक प्रावधानों को पुनः प्रभावी कर दिया था। साथ ही, यह भी प्रतिपादित किया गया कि वर्तमान नियमों की भाषा अत्यंत जटिल एवं दुरूह है, जिससे उनके दुरुपयोग की संभावनाएँ प्रबल हो सकती हैं।

राजनीतिक एवं सामाजिक परिप्रेक्ष्य में यह विषय व्यापक उथल-पुथल का कारण बन गया है। देशभर के विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में छात्र संगठनों के मध्य स्पष्ट वैचारिक विभाजन दृष्टिगोचर हो रहा है। भीम आर्मी, AISA तथा अन्य अनेक संगठन इन नियमों के समर्थन एवं विरोध में व्यापक प्रदर्शन कर रहे हैं। एक पक्ष इसे सामाजिक न्याय एवं समानता की दिशा में आवश्यक कदम मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे शैक्षिक वातावरण में विभाजन एवं असंतोष का कारक मान रहा है।

आज की सुनवाई केवल विधिक निर्णय तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह राष्ट्र की शैक्षिक नीति, सामाजिक समरसता एवं संवैधानिक मूल्यों के मध्य संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हो सकती है। समस्त देश की दृष्टि अब सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक निर्णय पर केंद्रित है, जो आने वाले समय में शिक्षा एवं समाज की दिशा को पुनर्परिभाषित कर सकता है।