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Vaccine Heart Disease: स्टडी में हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा कम होने का दावा, जानें क्या आया सामने

Vaccine Heart Disease: नई स्टडी में शिंगल्स की नई वैक्सीन लेने वालों में दिल की बीमारी और हार्ट फेल्योर का खतरा कम पाया गया। जानें रिसर्च में क्या सामने आया और इसकी सीमा क्या है।

Vaccine Heart Disease

Vaccine Heart Disease:  दाद यानी शिंगल्स से बचाने वाली वैक्सीन को लेकर एक नई स्टडी में दिल से जुड़ी बीमारियों को लेकर अहम जानकारी सामने आई है। शोधकर्ताओं ने पाया कि नई शिंगल्स वैक्सीन लेने वाले लोगों में दिल की बीमारी, हार्ट फेल्योर और दिल की धड़कन अनियमित होने जैसी समस्याएं कुछ कम देखी गईं।

पुरुषों में इस्केमिक स्ट्रोक का खतरा भी करीब 12 प्रतिशत कम पाया गया। हालांकि, शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि इन नतीजों का मतलब यह नहीं है कि शिंगल्स वैक्सीन सीधे तौर पर दिल की बीमारी या स्ट्रोक से बचाती है। स्टडी में दोनों के बीच एक संभावित संबंध देखा गया है और इसे पक्का साबित करने के लिए अभी और रिसर्च की जरूरत है।

Nature Medicine में प्रकाशित हुई स्टडी

यह रिसर्च मेडिकल जर्नल Nature Medicine में प्रकाशित हुई है। शोधकर्ताओं ने अमेरिका के बड़े हेल्थ रिकॉर्ड का इस्तेमाल किया। इसमें 60 साल या उससे ज्यादा उम्र के लोगों को शामिल किया गया था।

रिसर्च में उन लोगों की तुलना की गई, जिन्हें पुरानी शिंगल्स वैक्सीन दी गई थी और उन लोगों की, जिन्हें बाद में इस्तेमाल में आई नई वैक्सीन दी गई। शोधकर्ताओं ने लोगों की उम्र, पहले से मौजूद बीमारियों और दवाओं जैसी कई बातों को ध्यान में रखकर दोनों समूहों की तुलना की।

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करीब सात साल तक देखा गया असर

स्टडी के लिए अमेरिका के करीब 60 हेल्थ सेंटर से डेटा लिया गया। इस नेटवर्क में 10 करोड़ से ज्यादा लोगों के हेल्थ रिकॉर्ड मौजूद थे। मुख्य विश्लेषण में 36,460-36,460 लोगों के दो समूह बनाए गए। दोनों समूहों की स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए तुलना की गई और करीब सात साल तक उनके स्वास्थ्य रिकॉर्ड देखे गए।

रिसर्च के दौरान अमेरिका में पुरानी शिंगल्स वैक्सीन की जगह नई वैक्सीन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा था। पुराने दौर में करीब 98.6 प्रतिशत लोगों को पुरानी वैक्सीन मिली थी, जबकि एक साल बाद के दौर में करीब 93.5 प्रतिशत लोगों को नई वैक्सीन दी गई। शोधकर्ताओं के अनुसार, नई वैक्सीन वाले समूह में सात साल के दौरान दिल और नसों से जुड़ी बीमारियों का कुल खतरा करीब 9 प्रतिशत कम पाया गया। हालांकि, समय बीतने के साथ यह अंतर कम होता गया।

हार्ट फेल्योर और दिल की बीमारी में भी कमी

स्टडी में दिल की नसों से जुड़ी बीमारी के मामलों में करीब 10 प्रतिशत की कमी देखी गई। वहीं, हार्ट फेल्योर का खतरा करीब 12 प्रतिशत कम पाया गया। पुरुषों और महिलाओं दोनों में इन नतीजों में ज्यादा अंतर नहीं था। इसके अलावा, एट्रियल फिब्रिलेशन यानी दिल की धड़कन के अनियमित होने की समस्या का खतरा भी नई वैक्सीन वाले लोगों में करीब 7 प्रतिशत कम पाया गया। हालांकि, हर तरह की दिल और नसों से जुड़ी बीमारी में कमी नहीं मिली। कुछ बीमारियों में दोनों समूहों के बीच खास अंतर नहीं देखा गया।

स्ट्रोक को लेकर क्या मिला?

इस्केमिक स्ट्रोक के मामलों में दोनों समूहों के बीच कुल मिलाकर कोई बड़ा अंतर नहीं मिला। लेकिन जब पुरुषों और महिलाओं के आंकड़ों को अलग-अलग देखा गया, तो पुरुषों में इस्केमिक स्ट्रोक का खतरा करीब 12 प्रतिशत कम पाया गया। इस आंकड़े को लेकर सावधानी जरूरी है। इसका यह मतलब नहीं है कि शिंगल्स वैक्सीन हर पुरुष में स्ट्रोक का खतरा 12 प्रतिशत कम कर देती है। स्टडी में केवल एक संभावित संबंध सामने आया है।

वैक्सीन का दिल पर असर क्यों हो सकता है?

शोधकर्ताओं का मानना है कि इसके पीछे शरीर की इम्यूनिटी और सूजन से जुड़ी प्रक्रिया की भूमिका हो सकती है। नई शिंगल्स वैक्सीन शरीर की इम्यूनिटी को लंबे समय तक सक्रिय रख सकती है। शरीर में लंबे समय तक रहने वाली ज्यादा सूजन को दिल की कुछ बीमारियों के खतरे से जोड़ा गया है। इसलिए शोधकर्ताओं का अनुमान है कि वैक्सीन और दिल की बेहतर सेहत के बीच कोई संबंध हो सकता है। हालांकि, इस बात की अभी पूरी पुष्टि नहीं हुई है। स्टडी में यह भी देखा गया कि शुरुआती वर्षों में दिल की बीमारियों का अंतर ज्यादा था, लेकिन बाद के वर्षों में यह अंतर कम होता गया।

इसे हार्ट अटैक से बचाने वाली वैक्सीन न समझें

इस रिसर्च के नतीजे जरूर दिलचस्प हैं, लेकिन अभी शिंगल्स वैक्सीन को हार्ट अटैक या स्ट्रोक से बचाने वाली वैक्सीन नहीं माना जा सकता। यह एक ऐसी स्टडी है जिसमें पहले से मौजूद हेल्थ रिकॉर्ड के आधार पर लोगों की तुलना की गई। इसमें धूम्रपान, खान-पान, शराब का सेवन, शिक्षा, नौकरी और आय जैसी कुछ चीजों की पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं थी। ये सभी चीजें दिल की बीमारी के खतरे को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए यह पक्का नहीं कहा जा सकता कि स्टडी में दिखी कमी सिर्फ शिंगल्स वैक्सीन की वजह से हुई। इस संबंध को समझने के लिए आगे और रिसर्च की जरूरत होगी।