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Bihar School News: बिहार के इस स्कूल में गुरुजी ज्यादा, चेले हैं कम, 9 बच्चों के लिए तैनात हैं 4-4 महारथी! विद्यालय में तालीम गायब... तामझाम फुल!

Bihar School News: बिहार की सियासत में अक्सर शिक्षा, तरक़्क़ी और सुधार के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हक़ीकत जब सामने आती है तो हुकूमत के दावों पर खुद-ब-खुद पोल खुल जाता है।...

MUZAFFARPUR More Teachers Than Students in School Education
शिक्षा व्यवस्था का अजब-गजब मॉडल- फोटो : reporter

Bihar School News: बिहार की सियासत में अक्सर शिक्षा, तरक़्क़ी और सुधार के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हक़ीकत जब सामने आती है तो हुकूमत के दावों पर खुद-ब-खुद पोल खुल जाता है। ताज़ा मिसाल है मुजफ्फरपुर ज़िले के सकरा प्रखंड का राजकीय प्राथमिक विद्यालय जगदीशपुर बनवारी, जो इन दिनों अपने अनोखे मॉडल के लिए चर्चा में है। यह स्कूल न तो बच्चों की संख्या के लिए मशहूर है और न ही नतीजों के लिए, बल्कि सरकारी सिस्टम की उस तस्वीर के लिए, जहां संसाधन भरपूर हैं लेकिन असर नदारद।

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इस स्कूल में कक्षा 1 से 5 तक पढ़ाई होती है, मगर कुल नामांकन सिर्फ 9 बच्चों का है। हैरत की बात यह नहीं कि बच्चे कम हैं, बल्कि यह है कि उन 9 बच्चों को पढ़ाने के लिए सरकार ने एक प्रधानाध्यापिका, दो शिक्षिकाएं और एक शिक्षक, यानी कुल चार शिक्षक तैनात कर रखे हैं। ऊपर से मध्याह्न भोजन के लिए दो अलग कर्मी भी नियुक्त हैं। यानी नौ बच्चों पर छह सरकारी कर्मचारी मानो हर बच्चे के हिस्से में पूरा सरकारी अमला खड़ा हो।

सवाल यह नहीं कि स्कूल चल रहा है या नहीं, सवाल यह है कि हर महीने लाखों रुपये का सरकारी ख़ज़ाना आखिर किस तालीम पर खर्च हो रहा है? क्या यही है शिक्षा में सुधार का रोडमैप, या फिर यह सिर्फ काग़ज़ों में चलने वाली व्यवस्था का नमूना?

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अगर स्कूल की दिनचर्या पर नज़र डालें तो तस्वीर और भी दिलचस्प हो जाती है। रोज़ के मध्याह्न भोजन में बच्चों के लिए महज़ एक किलो चावल पकता है, उसी हिसाब से दाल और सब्ज़ी बनती है। पूरे महीने का मिड-डे मील खर्च करीब 1500 रुपये बताया जा रहा है। इसके बावजूद स्कूल नियमित रूप से संचालित होता है, रजिस्टर अपडेट रहते हैं और सिस्टम इत्मीनान से सोया रहता है क्योंकि न ऊपर से कोई पूछने वाला है, न नीचे से कोई सवाल उठाने वाला।

प्रधानाध्यापिका कुमारी मीनू का कहना है कि स्कूल में पढ़ाई पूरी नियमित है और सभी 9 बच्चे रोज़ स्कूल आते हैं। उनके मुताबिक कक्षा एक में दो, कक्षा दो में तीन, कक्षा तीन में एक, कक्षा चार में दो और कक्षा पांच में एक छात्रा नामांकित है। मध्याह्न भोजन भी सरकारी मेन्यू के मुताबिक ही दिया जाता है और उपस्थिति में कोई कमी नहीं है।

उधर शिक्षक यह दलील दे रहे हैं कि वे बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। हर हफ्ते गांव में जाकर अभिभावकों से मिलते हैं, तालीम की अहमियत समझाते हैं और सरकारी योजनाओं का हवाला देते हैं। मगर हक़ीक़त यह है कि तमाम कोशिशों के बावजूद स्कूल में बच्चों की संख्या जस की तस बनी हुई है।

बहरहाल यह स्कूल बिहार की शिक्षा व्यवस्था का वह आईना है, जिसमें नीयत और नीति के बीच का फर्क साफ़ दिखता है। यहां शिक्षा से ज़्यादा तंत्र भारी है, और सवाल यह है कि हुकूमत इस आईने में खुद को देखने की हिम्मत कब करेगी।

रिपोर्ट- मणिभूषण शर्मा