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Bihar School News:बिहार के सरकारी स्कूल बने हादसों का अड्डा! गिरते प्लास्टर और जर्जर छत से छात्रों की जान पर खतरा, कितना सुरक्षित है आपका बच्चा?

Bihar School News:बिहार का जिला शिक्षा विभाग 'गहरे चिंतन' में लीन है, लगता है। ऐसा हम नहीं, बल्कि उनका 'लापरवाह' रवैया 'चीख-चीख' कर कह रहा है।

Bihar School News
सरकारी स्कूल बने हादसों का अड्डा! - फोटो : social Media

Bihar School News:बिहार का जिला शिक्षा विभाग 'गहरे चिंतन' में लीन है, लगता है। ऐसा हम नहीं, बल्कि उनका 'लापरवाह' रवैया 'चीख-चीख' कर कह रहा है। अरे जनाब, अभी हाल ही में राजस्थान के बांसवाड़ा में एक स्कूल की छत गिर गई थी, लेकिन हमारे 'अक्लमंद' शिक्षा विभाग को उससे क्या! वो तो तब तक 'कुंभकर्णी नींद' में लीन रहेंगे, जब तक अपने बिहार में कोई 'बड़ा हादसा' न हो जाए। शायद उन्हें लगता है कि 'बच्चों की जान' से ज़्यादा ज़रूरी 'सरकारी फाइलों का वजन' बढ़ाना है।

जरा 'तस्वीर' देखिए! भागलपुर जिला मुख्यालय से लेकर 'देहात' तक, कितने ही 'ज्ञान के मंदिर' (यानी स्कूल) जर्जर पड़े हैं। कहीं छत से 'प्लास्टर' टूटकर 'धड़ाम' से गिरता है, तो कहीं 'शौचालय' और 'पानी' जैसी 'मूलभूत' सुविधाएँ भी 'विलुप्त' हो चुकी हैं। बच्चे बेचारे 'कुर्सी-टेबल' पर नहीं, 'खौफ' के साये में पढ़ते हैं।

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सबसे 'मजेदार' बात तो यह है कि तिलकामांझी में एक 'मुक्ति विद्यालय' है, जिसका दो-मंजिला भवन आठ साल पहले ही 'इंजीनियर' साहबान ने 'जर्जर' घोषित कर 'तोड़ने' का फरमान सुना दिया था। लेकिन क्या मजाल कि 'सरकारी बाबू' इस पर 'कान' धरें! आज भी उसी 'खस्ताहाल' भवन में 'सेंकड़ों मासूम' अपनी 'किस्मत' आज़मा रहे हैं। ताज्जुब तो ये है कि 1969 में बने इस 'खंडर' में एक नहीं, 'दो-दो स्कूल' चल रहे हैं! सुबह 'मदनलाल कन्या प्लस टू विद्यालय' की करीब 200 'लड़कियाँ' अपनी 'जान' हथेली पर रखकर पढ़ती हैं, और फिर दिन की 'शिफ्ट' में 'मध्य विद्यालय' के बच्चे आते हैं।

भवन की 'दीवारें' दरक चुकी हैं, बारिश में 'सीलन' अपनी 'कहानी' सुनाती है, खिड़कियाँ टूटी हैं और दरवाजे भी 'अपनी मर्ज़ी' के मालिक हैं। 'वायरिंग' की तो बात ही छोड़िए, वो तो बस 'हादसे को दावत' दे रही है। माना कि स्कूल परिसर में और भी भवन हैं, पर 'कमरों की कमी' के कारण 'मजबूरन' इन 'मासूमों' को 'मौत के कुएँ' में बिठाया जाता है। 'फर्श' भी ऐसे टूटा है, जैसे किसी 'पुराने किले' का हो। 'शौचालय' भी हैं, पर उनकी 'सफाई' ऐसी है कि 'इस्तेमाल' करने से पहले 'सोचना' पड़ता है।

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कमाल' तो ये है कि स्कूल वाले 'चिट्ठियाँ' पर 'चिट्ठियाँ' भेज रहे हैं, 'गुहार' लगा रहे हैं, पर 'विभाग' के 'कान' पर 'जूँ' तक नहीं रेंगती। और हाँ, इसी 'जर्जर' भवन में 'मैट्रिक-इंटर' की 'परीक्षायें' भी करवाई जाती हैं। क्या 'गजब' का 'दिमाग' है!

अकबरनगर में भी 'कन्या मध्य विद्यालय श्रीरामपुर' का हाल कुछ अलग नहीं। 1971 में बनी ये 'इमारत' अब बस 'इतिहास' बनने को तैयार है। छत से 'प्लास्टर' टूटकर गिरता है, 'सरिया' बाहर झाँक रहा है, दीवारें 'धमकियाँ' दे रही हैं, और 'फर्श' तो 'हँस' रहा है 'व्यवस्था' पर। 'शौचालय' हैं, पर 'नर्क' से कम नहीं। 'प्राथमिक उपचार किट' और 'अग्निशमन यंत्र' जैसी 'जरूरी चीज़ें' तो मानो 'विदेशी' हों। प्रधानाध्यापिका ममता कुमारी भी 'बेचारी' थक चुकी हैं 'गुहार' लगाते-लगाते। वो कहती हैं कि बच्चे और शिक्षक 'भय' के माहौल में जीते हैं।