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Bihar School News: 4 बच्चों पर 4 शिक्षक, नालंदा का सरकारी स्कूल बना रिवर्स मॉडल, हर महीने 1.48 लाख खर्च, शिक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल

Bihar School News: बिहार में शिक्षा विभाग का नियम कहता है कि एक शिक्षक पर औसतन 30 छात्रों की जिम्मेदारी होनी चाहिए, लेकिन नालंदा जिले के हरनौत प्रखंड का एक सरकारी स्कूल इस व्यवस्था की बिल्कुल उल्टी तस्वीर पेश कर रहा है।...

Bihar School News
4 बच्चों पर 4 शिक्षक- फोटो : social Media

Bihar School News: बिहार में शिक्षा विभाग का नियम कहता है कि एक शिक्षक पर औसतन 30 छात्रों की जिम्मेदारी होनी चाहिए, लेकिन नालंदा जिले के हरनौत प्रखंड का एक सरकारी स्कूल इस व्यवस्था की बिल्कुल उल्टी तस्वीर पेश कर रहा है। यहां चार बच्चों को पढ़ाने के लिए चार शिक्षक तैनात हैं, जिनके वेतन पर सरकार हर महीने करीब 1.48 लाख रुपये खर्च कर रही है। अब यह मामला सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल और शिक्षा व्यवस्था की योजना पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

हरनौत प्रखंड की चौरिया पंचायत स्थित न्यू प्राइमरी स्कूल, चिंतामनचक में कुल नामांकित छात्रों की संख्या सिर्फ चार है। हैरत की बात यह है कि कक्षा 1 और कक्षा 3 में एक भी छात्र नहीं है। कक्षा 2 में हिमांशु कुमार, कक्षा 4 में साहिल कुमार और कक्षा 5 में राहुल कुमार व संजीत कुमार पढ़ते हैं। यानी पूरे विद्यालय की पढ़ाई महज चार बच्चों के सहारे चल रही है।

स्कूल में प्रधान शिक्षिका पुष्पांजलि कुमारी के अलावा बीपीएससी से नियुक्त शिक्षक रौशन राज, पंचायत शिक्षिका धर्मशीला कुमारी और संगीता कुमारी कार्यरत हैं। शिक्षकों का कहना है कि बच्चों की इतनी कम संख्या के कारण न तो खेलकूद जैसी गतिविधियां हो पाती हैं और न ही पढ़ाने का सामान्य माहौल बन पाता है। प्रधान शिक्षिका ने शिक्षा विभाग से दूसरे विद्यालय में स्थानांतरण की मांग भी की है।

दूसरी ओर, चारों बच्चों का दर्द भी अलग है। छात्रों ने बताया कि उनके माता-पिता रोजगार के लिए गुजरात के सूरत समेत अन्य राज्यों में रहते हैं और वे गांव में दादी या रिश्तेदारों के साथ रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। बच्चों का कहना है कि पढ़ाई अच्छी होती है, शिक्षक समय पर आते हैं, लेकिन साथी छात्रों की कमी के कारण स्कूल का माहौल सूना रहता है।

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दरअसल, चिंतामनचक महज 25-30 घरों वाला छोटा-सा टोला है। स्थानीय शिक्षिका संगीता कुमारी बताती हैं कि रोजगार की तलाश में अधिकांश परिवार पलायन कर चुके हैं। छोटे बच्चे गांव में बचे ही नहीं हैं और जो बड़े बच्चे हैं, वे आसपास के दूसरे विद्यालयों में पढ़ने चले गए हैं।

इस स्कूल की स्थापना 2007 में ग्रामीणों द्वारा दान की गई करीब साढ़े चार कट्ठा जमीन पर हुई थी। शुरुआत में यहां 20 से 30 छात्र पढ़ते थे, लेकिन पलायन और घटती आबादी के कारण अब संख्या घटकर केवल चार रह गई है।

मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि शिक्षा विभाग के मानकों के अनुसार 60 छात्रों तक कम-से-कम दो शिक्षक और छात्र संख्या बढ़ने के साथ अतिरिक्त शिक्षकों की तैनाती का प्रावधान है। लेकिन यहां हालात ऐसे हैं कि चार छात्रों पर चार शिक्षक मौजूद हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या विभाग को ऐसे स्कूलों का पुनर्गठन, शिक्षकों का समायोजन और संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित नहीं करना चाहिए, ताकि जहां शिक्षकों की कमी है वहां उनका लाभ मिल सके।