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Shravan Somwar: अमृत-मंथन से जगदम्बा के तप तक, जानिए श्रावण मास और नीलकंठ महादेव के सोमवार के पावन व्रत का तात्विक रहस्य

Shravan Somwar: सनातन संस्कृति और वैदिक परम्परा में श्रावण मास केवल एक कालखंड नहीं, अपितु भक्ति, साधना और आत्मशुद्धि की पावन चेतना का संवाहक है।

Shravan Somwar
सोमवार के पावन व्रत का तात्विक रहस्य- फोटो : social Media

Shravan Somwar: सनातन संस्कृति और वैदिक परम्परा में श्रावण मास केवल एक कालखंड नहीं, अपितु भक्ति, साधना और आत्मशुद्धि की पावन चेतना का संवाहक है। भगवान आशुतोष, जो स्वयं निराकार, ॐकार के मूल स्रोत, वाक्, ज्ञान और ज्ञानेन्द्रियों की सीमा से सर्वथा परे हैं, वे काल के भी महाकाल हैं। इस अलौकिक मास में सोमवार को महादेव की आराधना का अक्षय पुण्य फल प्राप्त होता है।

समुद्र मंथन और हलाहल पान का तात्विक रहस्य

पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब देवों और दानवों द्वारा अमरत्व प्रदान करने वाले अमृत की प्राप्ति हेतु क्षीरसागर का मंथन किया गया, तब सर्वप्रथम कालकूट नामक हलाहल विष का प्राकट्य हुआ। इस भयंकर विष की उग्रता सम्पूर्ण ब्रह्मांड को भस्म करने में समर्थ थी। जगत् के परित्राण हेतु भगवान शिव ने बिना किसी संकोच के उस विष का पान कर लिया। विष की उग्र ज्वाला को उदर में प्रवेश करने से रोकने हेतु जगज्जननी भगवती पार्वती ने शिव के कण्ठ को स्पर्श किया। विष का प्रभाव कण्ठ में ही स्थिर रहा, जिससे उनका कण्ठ नील वर्ण का हो गया और वे नीलकण्ठ नाम से प्रख्यात हुए। यह घटना श्रावण मास में घटित हुई थी। विष की तीक्ष्ण उष्णता को शांत करने हेतु देवताओं ने उन पर शीतल गंगाजल का अभिषेक किया। तभी से श्रावण मास में शिवलिंग पर जलाभिषेक की परम्परा अनवरत प्रवाहित हो रही है।

माता पार्वती का अनन्य तप और व्रत का उद्गम

शिवपुराण के अंतर्गत यह वर्णन प्राप्त होता है कि इस दिव्य व्रत का सर्वप्रथम अनुष्ठान स्वयं भगवती जगदम्बा पार्वती द्वारा किया गया था। महादेव को पति रूप में प्राप्त करने की अभिलाषा से उन्होंने श्रावण मास में निराहार एवं निर्जल रहकर घोर तपस्या की। इसी अनन्य समर्पण से प्रसन्न होकर आशुतोष शिव ने श्रावण मास में ही उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करने का वरदान प्रदान किया। तदुपरान्त ही सोलह सोमवार एवं श्रावण सोमवार के व्रतों की नींव पड़ी। यही कारण है कि यह व्रत कन्याओं हेतु अभीष्ट एवं योग्य वर की प्राप्ति तथा विवाहित स्त्रियों हेतु अखंड सौभाग्य का फलदायी माना गया है।

ज्योतिषीय एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण

सोम का शाब्दिक अर्थ चन्द्रमा होता है, जो मानव मन, मस्तिष्क और भावनाओं का अधिष्ठाता ग्रह है।चंद्रमा मनसो जातः वैदिक ज्योतिष और हिंदू दर्शन में चंद्रमा को मन का कारक और स्वामी माना गया है। चन्द्रमा मनसो जातः चक्षोः सूर्यो अजायत ,भगवान शिव के मस्तक पर सुशोभित बालचंद्र यह दर्शाता है कि वे काल और चंचल मन पर पूर्ण नियंत्रण रखने वाले परमेश्वर हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, श्रावण सोमवार का व्रत करने से चंद्र दोष, राहु दोष एवं कालसर्प योग जैसे उग्र ग्रह दोषों का शमन होता है और साधक को मानसिक शांति तथा आत्मिक बल प्राप्त होता है।

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संपादक कौशलेंद्र प्रियदर्शी की कलम से....