ग्रह-नक्षत्रों के वैज्ञानिक गणनाओं से पता चला कब अवतरित हुए थे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, कमलनयन के जन्मकाल को लेकर सामने आए रहस्यमयी तथ्य, जानिए चौंकाने वाला वैज्ञानिक दावा

Ram Navami: चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्म हुआ, जिसे आज समस्त भारतवर्ष में रामनवमी के रूप में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।

Scientific Calculations Reveal Exact Birth Time of Lord Ram
श्रीराम जन्म का सहस्राब्दियों के पार गूंजता सत्य- फोटो : Sakshi

Ram Navami: पटना सहित सम्पूर्ण बिहार में आज रामनवमी का पावन उत्सव अत्यन्त उल्लास, श्रद्धा एवं आध्यात्मिक उन्मेष के साथ मनाया जा रहा है। प्रभातकाल से ही देवालयों में श्रद्धालुओं की विशाल पंक्तियाँ दृष्टिगोचर हो रही हैं। सर्वत्र जय श्रीराम के घोष से वातावरण गुंजायमान है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को यद्यपि अवतारी पुरुष के रूप में मान्यता प्राप्त है, तथापि उन्होंने भी सामान्य शिशु के समान मातृगर्भ से ही अवतरण किया यह तथ्य उन्हें दिव्यता के साथ-साथ मानवता से भी अभिन्न रूप से जोड़ता है।

पुराणों और प्राचीन ग्रंथों में श्रीराम के जन्मकाल को लेकर पर्याप्त जानकारी विद्यमान हैं। प्रचलित मान्यता के अनुसार, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को उनका जन्म हुआ, जिसे आज समस्त भारतवर्ष में रामनवमी के रूप में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। यह तिथि श्रीराम के अवतरण की प्रतीक मानी जाती है, परंतु काल-निर्धारण की दृष्टि से यह विषय अत्यन्त जटिल प्रतीत होता है।

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इतिहास के दीर्घ प्रवाह में असंख्य सभ्यताओं का उदय एवं पतन हुआ, इसके बावजूद ये सर्वमान्य है कि प्रभु का जन्म अभिजूत मुहुर्त में हुआ था , जिसे अब वैज्ञानिक भी मान रहे हैं। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के बालकाण्ड में श्रीराम के जन्म का अत्यन्त सूक्ष्म और खगोलीय विवरण प्राप्त होता है। जन्म सर्ग के अष्टादश श्लोकों में यह उल्लेखित है कि चैत्र शुक्ल नवमी के दिन, अभिजीत मुहूर्त में श्रीराम का जन्म हुआ। 

विशेषतः आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि आधुनिक संगणकीय (कंप्यूटर) गणनाओं के आधार पर इस तिथि का निर्धारण 21 फरवरी, 5115 ईसा पूर्व के रूप में किया गया है।

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इसी प्रकार गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस के बालकाण्ड में भी श्रीराम के जन्मकालीन ग्रह-नक्षत्रों का समुचित उल्लेख मिलता है। तुलसीदास ने उनके जीवन के विविध चरणों का वर्णन करते हुए यह भी संकेत दिया है कि सोलहवें वर्ष में उन्होंने महर्षि विश्वामित्र के साथ तपोवन गमन किया और युद्धकला में प्रावीण्य प्राप्त किया। बाबा तुलसी ने लिखा है-

नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥

मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥

(पवित्र चैत्र का महीना था, नवमी तिथि थी। शुक्ल पक्ष और भगवान का प्रिय अभिजित मुहूर्त था। दोपहर का समय था। न बहुत सर्दी थी, न धूप (गरमी) थी। वह पवित्र समय सब लोकों को शांति देनेवाला था।)

दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च ऑन वेदा (आई-सर्वे) द्वारा किए गए अनुसंधान ने इस विषय को नवीन आयाम प्रदान किया है। इस संस्थान के विद्वानों अशोक भटनागर, कुलभूषण मिश्र एवं सरोज बाला ने खगोलीय स्थितियों का विश्लेषण कर यह प्रतिपादित किया कि वाल्मीकि द्वारा वर्णित ग्रह-नक्षत्रों के आधार पर श्रीराम के जन्म का काल निर्धारण संभव है। उनके अनुसंधानानुसार, श्रीराम का जन्म 10 जनवरी, 5114 ईसा पूर्व को हुआ था।

वाल्मीकि के अनुसार, उस समय पुनर्वसु नक्षत्र, कर्क लग्न तथा पाँच ग्रहों की उच्चतम स्थिति विद्यमान थी जो एक अत्यन्त दुर्लभ खगोलीय संयोग है। इस प्रकार के ग्रहयोग का पुनर्निर्माण आधुनिक प्लैनेटेरियम सॉफ्टवेयर के माध्यम से भी किया गया, जिससे विभिन्न तिथियाँ प्राप्त हुईं, जिनमें 4 दिसंबर, 9349 वर्ष पूर्व का संकेत भी सम्मिलित है।

इन समस्त तथ्यों एवं वैज्ञानिक विश्लेषणों के पश्चात अब सिद्ध होने लगा है कि प्रभु के जन्म के बारे में हमारे ऋषियों ने जो  ग्रह-नक्षत्रों का वर्णन किया है वह बिल्कुल सत्य है। श्रद्धा और आस्था के स्तर पर यह निर्विवाद सत्य है कि श्रीराम भारतीय संस्कृति, मर्यादा और आदर्शों के शाश्वत प्रतीक हैं, जिनका प्रभाव कालातीत है।