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Religion: बाँस चन्दन की गंध नहीं ले सकता, करील वसंत में नहीं खिलता… प्रभु की अहेतुकी कृपा से टूटेगी अज्ञान की बेड़ी, अन्य कोई साधन नहीं , पढ़िए

Religion: तुलसीदास जी कहते हैं कि यद्यपि मेरा हृदय पाषाण के समान कठोर और अज्ञान से समाच्छन्न है, तथापि प्रभु का स्वभाव परम कोमल, मृदुल और करुणामय है।...

कौशलेंद्र प्रियदर्शी
जीव का स्वाभाविक अज्ञान-प्रभु की अहेतुकी कृपा- फोटो : social Media

Religion: गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज अपनी पराभक्ति एवं परम दैन्य-भाव की पराकाष्ठा का प्रकटीकरण करते हुए श्री रघुनाथ जी के श्रीचरणों में निवेदन करते हैं। वे कहते हैं कि इस नश्वर संसार में मेरे जैसा सर्वथा साधनहीन, अज्ञान-तिमिर में निमग्न, पतनशील तथा विषय-वासनाओं के प्रपंच में आबद्ध अन्य कोई हतभाग्य प्राणी नहीं है। इसके विपरीत, हे माधव! आपके सदृश बिना किसी स्वार्थ अथवा कारण के करुणा की वर्षा करने वाला, आर्त-जनों का उद्धार करने वाला तथा भक्त-वत्सलता हेतु सर्वस्व त्याग करने वाला परमेश्वर द्वितीय नहीं है।

आप भक्तों के संताप का समूल विनाश करने के निमित्त ही अपने सच्चिदानन्दघन स्वरूप एवं परमधाम का परित्याग कर इस धरातल पर मानव रूप में अवतीर्ण होते हैं। ईश्वर का यह अवतार-ग्रहण ही उनके असीम त्याग का सर्वोत्कृष्ट प्रमाण है। इतने पर भी यदि जीव शोक, मोह और भय से संतप्त रहता है, तो यह विचारणीय है कि दयानिधान की करुणा का संस्पर्श उसे प्राप्त क्यों नहीं हो रहा?

बाबा  स्पष्ट स्वीकार करते हैं कि इस वैषम्य में ईश्वर का लेशमात्र भी दोष नहीं है, यह केवल जीव का ही अपराध है। जगदीश्वर ने जीव को मुक्ति-द्वार स्वरूप दुर्लभ मानव-शरीर प्रदान किया, जो ज्ञान और विवेक का अक्षय भण्डार है। किंतु विषयों के वशीभूत होने के कारण मानव ने इस दिव्य देह को प्राप्त करके भी जगदाधार परमेश्वर के वास्तविक स्वरूप को न पहचाना और न ही उनका भजन किया।

जिस प्रकार वंश (बाँस) स्वयं में निसार होने के कारण मलयज (चन्दन) की सुगन्ध को ग्रहण करने में असमर्थ रहता है और करील का वृक्ष पत्रहीन होने के कारण वसन्त ऋतु के आगमन पर भी पल्लवित नहीं होता उनमें चन्दन अथवा वसन्त का कोई दोष नहीं होता, वे दोनों स्वयं हतभाग्य हैं ठीक उसी प्रकार अहंकार, काम, क्रोध और मोह रूपी विकारों में आबद्ध, भक्ति-शून्य तथा विवेक-हीन मनुष्य परमेश्वर पर दोषारोपण नहीं कर सकता।

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तुलसीदास जी कहते हैं कि यद्यपि मेरा हृदय पाषाण के समान कठोर और अज्ञान से समाच्छन्न है, तथापि प्रभु का स्वभाव परम कोमल, मृदुल और करुणामय है। अंततः यह परम सत्य सिद्ध होता है कि इस अविद्या और अज्ञान रूपी सुदृढ़ शृंखला को छिन्न-भिन्न करने में केवल श्रीसीतानाथ जी की अहेतुकी कृपा ही समर्थ है। अन्य कोई भी साधन इस संसृति-चक्र से मुक्ति दिलाने में सक्षम नहीं है। अतः हे नाथ, इस दीन, पतित एवं शरणागत जीव पर अपनी करुणा-दृष्टिपात कर इसका उद्धार कीजिए।

संपादक कौशलेंद्र प्रियदर्शी की कलम से...