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Phalguna Amavasya 2026: 16 या 17 कब मनाया जाएगा फाल्गुन अमावस्या, इस दिन बन रहा है दुर्लभ संयोग, कर लें ये 1 छोटा सा काम, चमक जाएगी किस्मत !

Phalguna Amavasya 2026: फाल्गुन अमावस्या के दिन सुबह से ही घरों और मंदिरों में स्नान, तर्पण और पूजा-अर्चना की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। बुजुर्ग इसे केवल कर्मकांड का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन और सकारात्मक शुरुआत का अवसर बताते हैं।

फाल्गुन अमावस्या
कब मनेगा फाल्गुन अमावस्या?- फोटो : social media

Phalguna Amavasya 2026: फाल्गुन मास की अमावस्या हिंदू पंचांग में विशेष आध्यात्मिक महत्व रखती है। इसे पितरों की शांति, आत्मचिंतन और दान-पुण्य के लिए बेहद फलदायी माना जाता है। इस दिन सुबह से ही घरों और मंदिरों में स्नान, तर्पण और पूजा-अर्चना की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। बुजुर्ग इसे केवल कर्मकांड का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन और सकारात्मक शुरुआत का अवसर बताते हैं।

कब मनाई जाएगी फाल्गुन अमावस्या?

वैदिक पंचांग के अनुसार, इस वर्ष फाल्गुन अमावस्या की तिथि 16 फरवरी को शाम 5 बजकर 34 मिनट से शुरू होकर 17 फरवरी को शाम 5 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर यह अमावस्या 17 फरवरी 2026 को मनाई जाएगी।

धार्मिक महत्व

फाल्गुन अमावस्या को पितृ तर्पण और दान के लिए विशेष शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए तर्पण से पितृ प्रसन्न होते हैं और परिवार को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग नदी या तालाब किनारे तिल और जल से तर्पण करते नजर आते हैं, जबकि कई श्रद्धालु गंगा स्नान को विशेष पुण्यकारी मानते हैं। होली से पहले पड़ने वाली यह अमावस्या पुराने नकारात्मक भावों को त्यागकर नई शुरुआत का संकेत भी मानी जाती है।

इस दिन क्या करें?

स्नान और तर्पण- सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना शुभ माना जाता है। संभव हो तो पवित्र नदी में स्नान करें, अन्यथा घर पर गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है। इसके बाद तिल और जल से पितरों का तर्पण करें।

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दान-पुण्य- काले तिल, अन्न, वस्त्र या जरूरतमंदों को भोजन दान करना शुभ माना जाता है। कई घरों में खिचड़ी बनाकर गरीबों में बांटी जाती है।

दीपदान और पीपल पूजा- शाम के समय पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने की परंपरा भी है। इसे पितृ दोष शांति और घर में सकारात्मक ऊर्जा लाने वाला माना जाता है।

इस दिन क्या न करें?

विवाद और क्रोध से बचें- अमावस्या का दिन मानसिक शांति और आत्मचिंतन का होता है, इसलिए झगड़े और कटु शब्दों से दूर रहने की सलाह दी जाती है।

नकारात्मक सोच से दूरी- ईर्ष्या या किसी के लिए बुरा सोचने से बचना चाहिए।

तामसिक भोजन से परहेज- इस दिन लहसुन-प्याज, मांस-मदिरा और अत्यधिक मसालेदार भोजन से दूर रहकर सात्विक भोजन करना बेहतर माना जाता है।

बदलते समय में परंपरा की नई झलक

आज के दौर में कई लोग इन परंपराओं को अलग नजरिए से देखते हैं, लेकिन इनके पीछे सामाजिक और मानसिक संतुलन का विचार भी जुड़ा है। दान से समाज में सहानुभूति बढ़ती है, आत्मचिंतन से मन को शांति मिलती है और संयमित भोजन शरीर को आराम देता है। शहरों में रहने वाले लोग नदी तक न जा पाएं तो घर पर ही कुछ समय शांत बैठकर अपने पूर्वजों को स्मरण कर सकते हैं। फाल्गुन अमावस्या केवल एक तिथि नहीं, बल्कि ठहरकर सोचने, पितरों को याद करने और अपने भीतर की नकारात्मकता को छोड़ने का एक विशेष अवसर मानी जाती है। सच्ची श्रद्धा और सकारात्मक भावना के साथ किया गया हर कार्य इस दिन अधिक फलदायी माना जाता है।