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पुरानी पेंशन का रास्ता साफ! कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट की बड़ी राहत, इस श्रेणी के कर्मचारियों को मिलेगा लाभ

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के वर्ष 2020 के आदेश को बरकरार रखा। मामला पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड के कर्मचारियों से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने नियमितीकरण से पहले की उनकी सेवा को पेंशन के लिए गिने जाने की अनुमति दी थी।

Supreme Court
Supreme Court- फोटो : news4nation

Supreme Court :  सुप्रीम कोर्ट ने पेंशन को लेकर कर्मचारियों के हित में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि लंबे समय तक लगातार सेवा देने और बाद में नियमित किए गए कर्मचारियों को केवल तकनीकी आधार पर पेंशन संबंधी लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियमितीकरण से पहले अनुबंध, तदर्थ (ad hoc) या दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में की गई सेवा को भी पेंशन के लिए अर्हकारी सेवा में शामिल किया जाना चाहिए।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने 8 सितंबर 2026 को दिए फैसले में कहा कि सेवा में आने वाले काल्पनिक, कृत्रिम या प्रशासनिक अंतराल तथा अदालत के आदेश के कारण आए सेवा-विच्छेद को नजरअंदाज किया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में कर्मचारी की सेवा को पेंशन की गणना के लिए निरंतर माना जाएगा।

पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस मिश्रा ने कहा कि पेंशन कोई इनाम या अनुग्रह राशि नहीं, बल्कि कर्मचारी द्वारा अतीत में दी गई सेवा के बदले मिलने वाला स्थगित वेतन है। इसलिए जब किसी कर्मचारी ने लंबे समय तक लगातार सेवा की हो और बाद में उसे नियमित कर दिया गया हो, तो केवल तकनीकी आधार पर पेंशन संबंधी लाभ से इनकार करना सामान्य तौर पर उचित नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के वर्ष 2020 के आदेश को बरकरार रखा। मामला पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड के कर्मचारियों से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने नियमितीकरण से पहले की उनकी सेवा को पेंशन के लिए गिने जाने की अनुमति दी थी। इससे संबंधित कर्मचारी पुरानी पेंशन व्यवस्था के दायरे में आ सकेंगे, जबकि 1 जनवरी 2004 से नई परिभाषित अंशदायी पेंशन योजना लागू की गई थी।

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बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि कर्मचारियों को टाइपिंग टेस्ट पास करना, एक साल की प्रोबेशन अवधि पूरी करना और मेडिकल प्रमाणपत्र देना जरूरी था। सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि बोर्ड ने 2001 की सरकारी नीति को ‘mutatis mutandis’ यानी आवश्यक बदलावों के साथ अपनाया था। ये शर्तें नई नियुक्ति नहीं, बल्कि बोर्ड की जरूरतों के अनुरूप किए गए आवश्यक संशोधन मात्र थीं।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि नियमितीकरण के लिए पहले की गई न्यायिक कार्यवाही बाद में पेंशन लाभ के दावे पर res judicata यानी पहले तय मामले के आधार पर रोक नहीं लगाती, क्योंकि दोनों मामलों में कारण और मांगी गई राहत अलग-अलग हैं।

कोर्ट ने कहा कि पेंशन के लिए अर्हकारी सेवा में सामान्य तौर पर बिना interruption की गई पूरी ड्यूटी शामिल होती है। समान परिस्थितियों वाले अन्य विभागों के कर्मचारियों को भी हाईकोर्ट से यही लाभ मिलने का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संबंधित कर्मचारियों को समान लाभ से वंचित करना प्रथम दृष्टया भेदभावपूर्ण होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अंततः माना कि कर्मचारियों को नियमित किया जा चुका है और उन्हें 1 जनवरी 2004 से पहले सरकारी सेवा में प्रवेश करने वाला माना जाएगा। उन्हें परिभाषित अंशदायी पेंशन व्यवस्था के Tier-II में रखा जाएगा और उनके पास पुरानी General Provident Fund पेंशन योजना या नई योजना में से किसी एक को चुनने का विकल्प होगा।