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POCSO में उम्र साबित करने के लिए अकेला बपतिस्मा प्रमाणपत्र मान्य नहीं, पीड़िता के नाबालिग होने पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश

पीठ ने कहा कि बच्चे की उम्र निर्धारित करने के लिए सबसे पहले स्कूल से जारी जन्म प्रमाणपत्र या मैट्रिकुलेशन प्रमाणपत्र को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि ये दस्तावेज उपलब्ध नहीं हों, तो नगर निगम, नगरपालिका या पंचायत द्वारा जारी जन्म प्रमाणपत्र पर विचार

POCSO Case Supreme Court
POCSO Case Supreme Court - फोटो : news4nation

POCSO :  सुप्रीम कोर्ट ने POCSO मामलों में नाबालिग पीड़िता की उम्र तय करने को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सिर्फ बपतिस्मा प्रमाणपत्र (Baptismal Certificate) के आधार पर किसी पीड़िता की नाबालिग उम्र साबित नहीं की जा सकती। उम्र निर्धारण के लिए अदालतों को किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act) में निर्धारित दस्तावेजों की प्राथमिकता का सख्ती से पालन करना होगा।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि बच्चे की उम्र निर्धारित करने के लिए सबसे पहले स्कूल से जारी जन्म प्रमाणपत्र या मैट्रिकुलेशन प्रमाणपत्र को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि ये दस्तावेज उपलब्ध नहीं हों, तो नगर निगम, नगरपालिका या पंचायत द्वारा जारी जन्म प्रमाणपत्र पर विचार किया जा सकता है। इन दस्तावेजों के अभाव में ही ऑसिफिकेशन टेस्ट या उम्र निर्धारित करने वाली अन्य चिकित्सकीय जांच का सहारा लिया जा सकता है।

यह फैसला पिंचेमलांगाकी बारेह की अपील पर आया, जिन्होंने मेघालय हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें विशेष POCSO अदालत की ओर से सुनाई गई सजा को बरकरार रखा गया था। आरोपी को IPC की धारा 506 और POCSO एक्ट की धारा 3(a), धारा 4 के तहत 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई थी।

मामला नवंबर 2019 में दर्ज FIR से जुड़ा था। एक महिला ने आरोप लगाया था कि उसकी 13 वर्षीय बेटी के साथ बारेह ने मेघालय के मोकॉइडलिंग, सुतंगा गांव में दुष्कर्म किया। अभियोजन पक्ष ने पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए 18 सितंबर 2016 का बपतिस्मा प्रमाणपत्र पेश किया था, जिसमें उसकी जन्मतिथि 5 मार्च 2006 दर्ज थी। हालांकि, प्रमाणपत्र जारी करने वाले चर्च के किसी अधिकारी को गवाही के लिए पेश नहीं किया गया और ऑसिफिकेशन टेस्ट भी नहीं कराया गया।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 94 में निर्धारित दस्तावेजों में से कोई भी दस्तावेज पेश करने में विफल रहा। इसलिए कानूनी तौर पर पीड़िता की नाबालिग उम्र स्थापित नहीं हो सकी।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नाबालिग साबित न होने का अर्थ यह नहीं है कि दुष्कर्म की घटना समाप्त हो जाती है। मेडिकल साक्ष्य, पीड़िता की गवाही और फॉरेंसिक सामग्री से यौन हिंसा का आरोप साबित हुआ।

10 सितंबर 2026 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने POCSO के तहत दोषसिद्धि और धारा 4(2) के तहत बढ़ाई गई सजा को रद्द कर दिया, लेकिन आरोपी को IPC की धारा 376 के तहत दुष्कर्म का दोषी माना। अदालत ने उसे 10 वर्ष के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। वहीं, IPC की धारा 506 के तहत आपराधिक धमकी की सजा बरकरार रखी गई।

पीठ ने यह भी कहा कि आरोप तय करते समय किसी धारा का उल्लेख न होना अपने आप में पूरी कार्यवाही को अमान्य नहीं करता, जब तक इससे आरोपी के साथ न्याय में कोई विफलता या वास्तविक पूर्वाग्रह न हुआ हो।