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'सावधान! जेब पर भारी पड़ने वाला है 'क्रूड ऑयल' का करंट; चुनाव खत्म होते ही पेट्रोल-डीजल की कीमतों में आ सकता है सुनामी जैसा उछाल'

कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों के बीच पेट्रोल ₹18 और डीजल ₹35 प्रति लीटर तक महंगा हो सकता है। जानें क्या कहती है विदेशी ब्रोकरेज फर्म मैक्वायरी की रिपोर्ट।

'सावधान! जेब पर भारी पड़ने वाला है 'क्रूड ऑयल' का करंट; चुनाव

N4N Business -पांच राज्यों के चुनावी शोर के बीच पेट्रोल-डीजल की कीमतें फिलहाल शांत हैं, लेकिन यह 'तूफान से पहले की शांति' हो सकती है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण तेल कंपनियों का घाटा ₹1,600 करोड़ प्रतिदिन तक पहुँच गया है, जो किसी भी वक्त कीमतों में बड़े विस्फोट की वजह बन सकता है। 

 विदेशी ब्रोकरेज फर्म मैक्वायरी (Macquarie) की ताजा रिपोर्ट ने आम आदमी की चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम स्थिर हैं। इसका सीधा खामियाजा तेल कंपनियों को भुगतना पड़ रहा है। वर्तमान स्थिति में कंपनियों को प्रति लीटर पेट्रोल पर ₹18 और डीजल पर ₹35 का घाटा उठाना पड़ रहा है। पिछले महीने के पीक स्तर पर तीनों प्रमुख तेल कंपनियां रोजाना करीब ₹2,400 करोड़ का नुकसान झेल रही थीं।

एक्साइज ड्यूटी में कटौती के बावजूद राहत कम

केंद्र सरकार द्वारा एक्साइज ड्यूटी में ₹10 की कटौती किए जाने के बाद कंपनियों का दैनिक घाटा ₹2,400 करोड़ से घटकर ₹1,600 करोड़ तो रह गया है, लेकिन संकट अभी टला नहीं है। आंकड़ों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में हर $10 के उछाल से तेल कंपनियों का घाटा ₹6 प्रति लीटर बढ़ जाता है। ऐसे में यदि कच्चे तेल की कीमतों में नरमी नहीं आई, तो कंपनियों के पास दाम बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।

आयात पर निर्भरता और बढ़ता चालू खाता घाटा (CAD)

भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 88% हिस्सा आयात करता है। इसमें से 45% खाड़ी देशों (मिडिल ईस्ट) और 35% रूस से आता है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें न केवल कंपनियों की बैलेंस शीट बिगाड़ रही हैं, बल्कि देश के चालू खाता घाटे (CAD) के लिए भी बड़ी चुनौती बन गई हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2026 की पहली तिमाही तक यह घाटा बढ़कर 20 अरब डॉलर के पार पहुँच सकता है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक चिंताजनक संकेत है।

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सरकारी राजस्व और एक्साइज ड्यूटी का गणित

पिछले 9 वर्षों में सरकारी राजस्व में तेल पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी का योगदान काफी कम हुआ है। वित्त वर्ष 2017 में यह 22% था, जो अब घटकर केवल 8% रह गया है। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि सरकार पूरी एक्साइज ड्यूटी हटा भी दे, तो भी मौजूदा वैश्विक कीमतों के आधार पर तेल कंपनियों का घाटा पूरी तरह खत्म नहीं होगा। यानी केवल टैक्स कटौती से राहत मिलना अब मुश्किल लग रहा है।

वैश्विक स्तर पर भी बढ़े दाम; अमेरिका और पड़ोसी देशों का हाल

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों का संकट केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत अगस्त 2022 के बाद पहली बार $4 प्रति गैलन के पार चली गई है। वहीं भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका भी ईंधन की कीमतों में भारी इजाफा कर चुके हैं। भारत में जून 2010 से पेट्रोल और अक्टूबर 2014 से डीजल की कीमतें तय करने का अधिकार तेल कंपनियों के पास है, जो अंतरराष्ट्रीय कीमतों और अन्य खर्चों के आधार पर रोजाना रेट तय करती हैं।

चुनावी मौसम के बाद बढ़ सकते हैं दाम

कयास लगाए जा रहे हैं कि पश्चिम बंगाल सहित 5 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के कारण फिलहाल कीमतें थमी हुई हैं। जैसे ही चुनावी प्रक्रिया समाप्त होगी, तेल कंपनियां अपने भारी घाटे की भरपाई के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में चरणबद्ध तरीके से बड़ी बढ़ोत्तरी कर सकती हैं। आने वाले समय में यह बढ़ोत्तरी परिवहन लागत को बढ़ाकर अन्य जरूरी चीजों की कीमतों में भी आग लगा सकती है।