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सिर्फ 20 बकरियों से बदल जाएगी किस्मत: ‘गोट मैन’ प्रो. संजीव कुमार ने बताया लखपति बनने का पूरा फॉर्मूला

सिर्फ 20 बकरियों से बदल जाएगी किस्मत: ‘गोट मैन’ प्रो. संजीव

पटना : आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना हर महिला का सपना होता है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में संसाधनों की कमी के कारण यह राह आसान नहीं होती। इस मुश्किल को आसान बनाया है 'द गोट ट्रस्ट' और इसके संस्थापक 'गोट मैन' प्रो. संजीव कुमार ने। सरकार के सहयोग से शुरू की गई उनकी इस अनूठी पहल ने यह साबित कर दिया है कि ग्रामीण महिलाएं अपने घर के आंगन में ही बकरी पालन (गोट फार्मिंग) को एक सम्मानजनक और बेहद मुनाफे वाले उद्यम में बदल सकती हैं। आज देश के पांच राज्यों में 50 हजार से अधिक पशुपालक परिवार इस मॉडल से जुड़कर अपनी तकदीर बदल चुके हैं, जिनमें सबसे बड़ी संख्या ग्रामीण महिलाओं की है।

'गोट मैन' प्रो. संजीव कुमार का मानना है कि बकरी पालन को हमेशा से "गरीबी का काम" समझा गया, लेकिन अगर इसे सही तकनीक और व्यावहारिक ज्ञान के साथ किया जाए, तो यह गरीबी उन्मूलन का सबसे अचूक हथियार है। उन्होंने महिलाओं को बकरी पालन शुरू करने और उसमें कामयाब होने के कुछ बेहद सरल और वैज्ञानिक उपाय सुझाए हैं। उनके अनुसार, शुरुआत हमेशा छोटे स्तर से करनी चाहिए। महिलाओं को सबसे पहले अपने स्थानीय परिवेश के अनुकूल उन्नत नस्ल की बकरियों का चयन करना चाहिए। इसके साथ ही, पारंपरिक रूप से बकरियों को खुले में चराने के बजाय 'अर्ध-बंधक' (Semi-stall feeding) पद्धति को अपनाना चाहिए, जहां उन्हें घर पर ही कम लागत वाला पौष्टिक चारा और हाइड्रोपोनिक्स हरा चारा दिया जा सके।

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कम लागत और वैज्ञानिक तरीके से ऐसे होगा बंपर मुनाफा

अब सवाल उठता है कि इस बिजनेस से महिलाओं को बड़ा लाभ कैसे होगा? प्रो. संजीव कुमार ने इसका पूरा गणित समझाया है। यदि कोई महिला 20 बकरियों और 1 बकरे से अपना काम शुरू करती है, तो वैज्ञानिक प्रबंधन के जरिए वह साल भर में लाखों रुपये का मुनाफा कमा सकती है। बकरियों में साल में दो बार बच्चे देने की क्षमता होती है, जिससे बहुत तेजी से उनका कुनबा बढ़ता है। लाभ को अधिकतम करने के लिए महिलाओं को समय पर टीकाकरण (Vaccination) और नियमित कृमिनाशक (Deworming) दवाएं देने की आदत डालनी होगी, जिससे पशुओं की मृत्यु दर शून्य हो जाती है और दवा का खर्च बेहद कम हो जाता है।

मुनाफे का दूसरा बड़ा जरिया केवल जीवित बकरियां बेचना नहीं, बल्कि उनके दूध और मूल्यवर्धित उत्पादों (Value-added products) का निर्माण है। द गोट ट्रस्ट महिलाओं को बकरी के दूध से साबुन, पनीर और अन्य उत्पाद बनाने की ट्रेनिंग देता है, जिनकी बाजार में भारी मांग है। इसके अलावा, बकरियों की लीद (वेस्ट) से बनने वाली जैविक खाद भी खेतों के लिए सोने जैसी होती है, जिसे बेचकर महिलाएं अतिरिक्त कमाई कर रही हैं। इस तरह, हर तरफ से लागत कम होती जाती है और मुनाफा सीधा महिलाओं के बैंक खातों में पहुंचता है।

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इस पूरे मॉडल की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसमें महिलाओं को बाजार की तलाश में भटकना नहीं पड़ता। 'द गोट ट्रस्ट' ने स्थानीय स्तर पर 'मीट बैंक' और 'लाइवस्टॉक क्रेडिट कार्ड' जैसी व्यवस्थाएं की हैं, जिससे महिलाओं को अपने पशुओं की सही कीमत सीधे अपने गांव में ही मिल जाती है।

'द गोट ट्रस्ट' से कैसे जुड़ सकती हैं महिलाएं?

इस क्रांतिकारी मुहिम से जुड़ने की प्रक्रिया को बहुत ही सरल और पारदर्शी बनाया गया है। ग्रामीण महिलाएं अपने क्षेत्र में सक्रिय 'द गोट ट्रस्ट' के केंद्रों पर जाकर या स्थानीय 'पशु सखी' से संपर्क करके इस अभियान का हिस्सा बन सकती हैं। संस्था द्वारा हर गांव में प्रत्येक 15 दिन पर 'डिजिटल लाइवस्टॉक फार्मर स्कूल' (DLFS) की कक्षाएं चलाई जाती हैं। इन स्कूलों में एंड्रॉयड मोबाइल और प्रोजेक्टर के जरिए स्थानीय भाषा में, महिलाओं की फुर्सत के समय के अनुसार 24 विषयों का विशेष ऑडियो-विजुअल प्रशिक्षण दिया जाता है।

इतना ही नहीं, इस मुहिम को राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (SRLM) और किसान उत्पादक संगठनों (FPO) के साथ भी जोड़ा गया है। इसका मतलब यह है कि जो महिलाएं स्वयं सहायता समूहों (SHG) से जुड़ी हैं, वे बेहद आसानी से सरकार से मिलने वाली सब्सिडी, लोन और अन्य योजनाओं का लाभ उठाकर सीधे 'द गोट ट्रस्ट' के तकनीकी नेटवर्क से जुड़ सकती हैं। आज इसी जुड़ाव का नतीजा है कि हजारों महिलाओं ने न सिर्फ अपनी माली हालत सुधारी है, बल्कि नेशनल हाईवे के किनारे खुद के ढाबे और सफल डेयरी आउटलेट्स चलाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का नया चेहरा बन गई हैं।