सारण की माटी से बिहार की सत्ता के शिखर तक पहुंचे दारोगा बाबू, 104वीं जयंती पर याद किया जा रहा संघर्ष और जनसेवा का सफर
पूर्व मुख्यमंत्री स्व. दारोगा प्रसाद राय की 104वीं जयंती पर नमन। 'गांधी सेतु' की परिकल्पना से लेकर गरीबों के लिए 'भूमि पर्चा कानून' तक, जानिए सामाजिक न्याय के इस महानायक का प्रेरणादायक सफर।

सारण की धरती ने बिहार को कई ऐसे जननेता दिए, जिन्होंने अपनी सादगी, संघर्ष और दूरदर्शिता से प्रदेश की राजनीति पर अमिट छाप छोड़ी है। इन्हीं में एक नाम पूर्व मुख्यमंत्री एवं स्वतंत्रता सेनानी स्व. दारोगा प्रसाद राय का है। दो सितंबर को उनकी 104वीं जयंती पर एक बार फिर उनके व्यक्तित्व, कृतित्व और राजनीतिक योगदान को याद किया जा रहा है। गांव की पगडंडियों से निकल कर बिहार की सत्ता के सर्वोच्च पद तक पहुंचने वाले दारोगा बाबू का जीवन आज भी संघर्ष और जनसेवा की प्रेरक कहानी है।
साधारण किसान परिवार में जन्म, पढ़ाई को बनाया सफलता की सीढ़ी
दारोगा प्रसाद राय का जन्म 2 सितंबर 1922 को सारण जिले के दरियापुर प्रखंड अंतर्गत बजहिया गांव में दुनिया राय के परिवार में हुआ था। सामान्य किसान परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने शिक्षा को अपने जीवन का आधार बनाया। प्रारंभिक शिक्षा डोगहा से हासिल करने के बाद उन्होंने दरिहरा सरैया विद्यालय से मिडिल की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उच्च विद्यालय परसा से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने छपरा के प्रसिद्ध राजेंद्र कॉलेज में दाखिला लिया। अर्थशास्त्र में उच्च शिक्षा पूरी करने के साथ कानून की पढ़ाई की और वकालत के क्षेत्र में भी कदम रखा। कुछ समय तक शिक्षक के रूप में भी समाज की सेवा की। शिक्षा, तर्कशक्ति और सामाजिक सरोकारों ने आगे चलकर उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को मजबूत आधार दिया।

आजादी के आंदोलन से शुरू हुआ जनसेवा का सफर
दारोगा प्रसाद राय स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े रहे। देश की आजादी के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा और कांग्रेस से जुड़ गए। 1952 में सारण के परसा विधानसभा क्षेत्र से पहली बार विधायक निर्वाचित हुए। इसके बाद उन्होंने लंबे समय तक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया और लगातार जनता के बीच अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी। उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने सत्ता को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के बजाय जनसेवा का माध्यम माना।

1970 में बने बिहार के मुख्यमंत्री
बिहार की राजनीति में दारोगा प्रसाद राय का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय तब जुड़ा, जब उन्होंने 16 फरवरी 1970 को बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। बिहार सरकार की आधिकारिक वेबसाइट भी उनके मुख्यमंत्री कार्यकाल की अवधि 16 फरवरी 1970 से 22 दिसंबर 1970 तक बताती है। लगभग दस महीने के छोटे कार्यकाल के बावजूद उन्होंने प्रशासन और विकास से जुड़े कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए। उनकी राजनीति का केंद्र समाज के कमजोर, पिछड़े और वंचित वर्गों को मुख्यधारा से जोड़ना था। सामाजिक न्याय और आम लोगों के अधिकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने उन्हें अलग पहचान दी।
पथ और भूमि पर्चा कानून से गरीबों को अधिकार दिलाने की पहल
दारोगा प्रसाद राय के राजनीतिक जीवन की चर्चा आज भी पथ और भूमि पर्चा कानून से जुड़े उनके प्रयासों के कारण होती है। उनके समर्थकों और जानकारों के अनुसार इन पहलों के माध्यम से गरीब और जरूरतमंद लोगों को उनके अधिकार दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण काम हुआ। उनका मानना था कि विकास का वास्तविक अर्थ तभी है, जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। उनकी विकास की सोच केवल योजनाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि सड़क, आवागमन और बुनियादी सुविधाओं को भी उन्होंने प्राथमिकता दी। इसी क्रम में गांधी सेतु की योजना को आगे बढ़ाने में उनके कार्यकाल की भूमिका को याद किया जाता है। बाद के वर्षों में यह पुल पटना को उत्तर बिहार से जोड़ने वाली जीवनरेखा साबित हुआ। दारोगा प्रसाद राय के पुत्र और समर्थक भी उनके राजनीतिक जीवन में गांधी सेतु से जुड़े योगदान को प्रमुखता से याद करते रहे हैं।
मंत्री से मुख्यमंत्री तक, हर भूमिका में छोड़ी छाप
दारोगा प्रसाद राय ने बिहार सरकार में विभिन्न महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। वित्त और उपमुख्यमंत्री जैसे पदों पर रहते हुए भी उन्होंने प्रशासनिक अनुभव हासिल किया। राजनीति में रहते हुए उनका संपर्क समाज के विभिन्न वर्गों से रहा, जिससे उन्हें आम लोगों की समस्याओं को करीब से समझने का अवसर मिला।उनकी राजनीतिक यात्रा उस दौर में आगे बढ़ी, जब बिहार की राजनीति लगातार राजनीतिक अस्थिरता से गुजर रही थी। ऐसे समय में दारोगा प्रसाद राय का मुख्यमंत्री बनना अपने आप में महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना थी। इतिहासकारों के अनुसार वे कांग्रेस के उस धड़े के नेता के रूप में उभरे, जो तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में सरकार बनाने में सफल रहा।
सादगी, संघर्ष और सिद्धांतों की राजनीति
दारोगा बाबू की पहचान केवल मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे जननेता के रूप में रही, जिसने सामान्य परिवार से निकलकर अपनी मेहनत के बल पर राजनीतिक ऊंचाई हासिल की। उनकी सादगी और जनता के बीच रहने की आदत ने उन्हें लोकप्रिय बनाया। वे राजनीति को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानते थे। उनका निधन 15 अप्रैल 1981 को हुआ, लेकिन उनके विचार और राजनीतिक विरासत आज भी चर्चा में हैं। उनके पुत्र डॉ. चंद्रिका राय ने भी बिहार की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई और अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया।
आज भी प्रासंगिक है दारोगा बाबू की विरासत
दारोगा प्रसाद राय की 104वीं जयंती केवल एक पूर्व मुख्यमंत्री को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि उस दौर की राजनीति और जनसेवा के मूल्यों को समझने का अवसर भी है। बजहिया गांव से निकला एक साधारण किसान परिवार का बेटा जब बिहार का मुख्यमंत्री बना, तो यह उस दौर में शिक्षा, संघर्ष और जनविश्वास की ताकत का प्रमाण था। आज राजनीति में जब विकास, सामाजिक न्याय और आम आदमी के अधिकारों की चर्चा होती है, तब दारोगा प्रसाद राय का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है। सारण की मिट्टी में जन्मे इस जननेता की कहानी बताती है कि साधारण शुरुआत भी असाधारण मंजिल तक पहुंच सकती है। यही कारण है कि समय बीतने के बावजूद दारोगा बाबू की जयंती पर उनका जीवन और संघर्ष नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का विषय बना हुआ है।
सारण से धर्मेन्द्र रस्तोगी की रिपोर्ट















