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Bihar News: आंगन ही बना श्मशान घाट, घर के सामने जलती चिता,एक ही चौखट पर ज़िंदगी और मौत, बिहार के महादलित टोला की हकीकत जानकर हैरान हो जाएंगे आप

एक ऐसा महादलित टोला, जहाँ घर का आंगन ही श्मशान बन चुका है। जहाँ बचपन की हँसी, माँ की लोरियाँ और बुज़ुर्गों की साँसें सब उसी ज़मीन पर दफ़्न हो जाती हैं, जिस पर रहने का हक़ आज तक नसीब नहीं हुआ।

Life and death at one doorstep Bihar
आंगन में चिता, आँखों में सवाल- फोटो : reporter

Bihar News: यह कोई कहानी नहीं, यह बिहार की धरती पर पसरी हुई एक सिसकती हुई हक़ीकत है। एक ऐसा महादलित टोला, जहाँ घर का आंगन ही श्मशान बन चुका है। जहाँ बचपन की हँसी, माँ की लोरियाँ और बुज़ुर्गों की साँसें सब उसी ज़मीन पर दफ़्न हो जाती हैं, जिस पर रहने का हक़ आज तक नसीब नहीं हुआ।

इस टोले में कदम रखते ही रूह काँप जाती है। झोपड़ी जैसे कच्चे घर, फूस की छतें, मिट्टी की दीवारें और उन्हीं आंगनों में बने श्मशान स्थल। मौत यहाँ परायी नहीं, रोज़मर्रा की मेहमान है। हैरत की बात यह है कि यहाँ रहने वाले महादलित परिवारों को न तो पाँच डिसमिल ज़मीन मिली, न ही आवास योजना की छाँव। ज़िंदगी झोपड़ी में सिमटी है और मौत भी उसी झोपड़ी की गोद में दफ़्न हो जाती है।

सुनील सादा, जिनकी आँखों में सालों का इंतज़ार और आवाज़ में टूटा हुआ भरोसा है, कहते हैं कि साहब, ज़मीन नहीं है, तो श्मशान कहाँ ले जाएँ? जब घर में किसी की मौत हो जाती है, तो दाह-संस्कार का सवाल ही पैदा नहीं होता। मजबूरी में शव को मिट्टी में गाड़ देते हैं, अपने ही आंगन में। यह कहते हुए उनकी आवाज़ काँप जाती है, जैसे हर लफ़्ज़ एक चीख़ बनकर सीने से निकल रहा हो।

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सैकड़ों महादलित परिवारों की यही दास्तान है। सरकार ने काग़ज़ों पर तीन डिसमिल ज़मीन का आवंटन कर दिया, मगर वह ज़मीन आज तक नज़र नहीं आई। कहाँ है वह जमीन? किस नक़्शे में दर्ज है? किसी को नहीं मालूम। नवहट्टा अंचल कार्यालय से लेकर सहरसा ज़िला मुख्यालय तक अर्ज़ियाँ दी गईं, दस्तख़त हुए, फ़ाइलें चलीं, मगर इंसाफ़ नहीं आया।

यहाँ हर आंगन एक सवाल है, हर क़ब्र एक इल्ज़ाम। यह टोला पूछ रहा है कि क्या ग़रीब की मौत की भी कोई क़ीमत नहीं? क्या महादलित होना इतना बड़ा जुर्म है कि ज़मीन जीते-जी भी न मिले और मरने के बाद भी?

 बहरहाल यह सिर्फ़ ज़मीन की लड़ाई नहीं, यह वजूद, इज़्ज़त और इंसानियत की जंग है जो आज भी एक महादलित आंगन में दबी पड़ी है।

रिपोर्ट- दिवाकर कुमार