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बिहार में बिक रही है मौत! मोतीहारी में जहरीली शराब ने छीना पिता का जीवन, शव के इंतजार में परिजन, नर्सिंग होम पैसे की खातिर नहीं कर रहा मौत की पुष्टि

Bihar News:बिहार में जीवन और मौत भी पैसों की मार्फत बिक रहे हैं। गरीब और मजबूर परिवारों के लिए इंसानियत और न्याय अब सिर्फ सपनों की तरह रह गए हैं। .......

Nursing Home Withholds Death Proof Over Fees
कहाँ छिप गई इंसानियत- फोटो : reporter

Bihar News:बिहार में स्वास्थ्य और लोगों की भलाई की बड़बोली बातें रोज मुख्यमंत्री से लेकर स्वास्थ्य मंत्री तक करते हैं। सूबे में पूर्ण शराबबंदी है, मगर लोग मरते हैं, और मरने के बाद भी इंसानियत मरती नजर आती है। मामला इतना कड़वा है कि नर्सिंग होम ने पैसे के लिए शव को परिवार के हवाले नहीं किया। आरोप है कि मौत की पुष्टि भी पैसे पर टिकी थी। विपक्षी दल के नेताओं के दबाव के बाद परिवार को शव मिला, लेकिन नर्सिंग होम अभी भी मौत की अधिकारिक पुष्टि नहीं कर रहा।

इस घटनाक्रम ने दिखा दिया कि जीवन और मौत भी पैसों की मार्फत बिक रहे हैं। गरीब और मजबूर परिवारों के लिए इंसानियत और न्याय अब सिर्फ सपनों की तरह रह गए हैं। मोतिहारी के रघुनाथपुर हरदिया के छोटे से घर में सन्नाटा और खौफ़ का माहौल था। घर का मुखिया लड्डू साह अब इस दुनिया में नहीं रहे। उनकी पांच मासूम बेटियां बार-बार दरवाजे की ओर देख रही थीं, जैसे अभी पापा की पैनी निगाहें और हँसी उनके सामने प्रकट होंगी। लेकिन हकीकत इतनी क्रूर थी कि कोई भी आंख इसे झेल न सके।

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पिछले चार-पांच दिनों से लड्डू विषाक्त पेयपदार्थ पीने के कारण शहर के निजी अस्पताल में भर्ती थे। परिजनों की उम्मीद और दिलासा डॉक्टरों के शब्दों में बंधा था। डॉक्टर कह रहे थे कि लड्डू को बेहतर इलाज के लिए रेफर करना होगा। लेकिन पैसों की कठिन हकीकत ने सबकुछ बदल दिया। नर्सिंग होम का बिल 73 हजार रुपए था और परिवार के पास न पैसा था, न कोई मदद। मशक्कत के बाद सोमवार को परिजनों ने 20 हजार रुपए इकठ्ठा करके नर्सिंग होम में जमा किए, तभी पता चला कि लड्डू की साँसें थम गई हैं। यह खबर जैसे बिजली बनकर घर में गिरी। चींख-पुकार और दर्द ने पूरे घर को गूँजित कर दिया।

लड्डू की सबसे छोटी बेटी ने मासूमियत से मां से पूछा, "मां, पापा कब आयेंगे?"  और मां की आंखें भर आईं, क्योंकि जवाब देना नामुमकिन था। उनके पापा अब कभी लौटकर नहीं आएंगे, और उनके शव की पूरी कीमत पैसे में नापी जा रही थी। आखिरकार 20 हजार रुपए जमा करने के बाद शव घर पहुंचा और परिवार ने अंतिम विदाई दी।

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लड्डू के चचेरे भाई सुनील साह ने बताया कि हमलोगों को तो चार अप्रैल को ही पता चल गया था कि लड्डडू की मौत हो गयी है,लेकिन नर्सिंग होम वाले उसके मरने की पुष्टि नहीं कर रहे थे, सिर्फ 73 हजार रूपये बिल भूगतान करने पर रेफर की बात कहते थे. राजद के राज्यस्तरीय टीम सोमवार को पहुंची, जिसके बाद 20 हजार रूपये देकर परिजन लड्डू का शव लिया, मंगलवार की सुबह उसके शव का पोस्टमार्टम हुआ, उसके बाद अंतिम संस्कार किया गया.   

इस दर्दनाक घटना ने केवल लड्डू की मौत नहीं दिखाई, बल्कि इंसानियत का घिनौना चेहरा भी सामने लाया। चचेरे भाई सुनील साह ने कहा, गरीबी से बड़ी कोई मजबूरी नहीं होती, लेकिन इंसानियत की कीमत भी क्या इतनी थी कि जीवन के साथ उसे भी बिकवाना पड़ा? यह कहानी न केवल लड्डू के परिजनों की बेहद दुखद स्थिति दर्शाती है, बल्कि समाज में पैसों और लालच की उस क्रूर सच्चाई को उजागर करती है जिसने इंसानियत की आखिरी झलक तक मार डाली। यह हादसा हमें याद दिलाता है कि जीवन की कीमत सिर्फ पैसों में नहीं, इंसानियत और संवेदना में भी होती है।

रिपोर्ट- हिमांश कुमार