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"यह टूरिज्म पैकेज नहीं, आस्था का विधान है": ऑनलाइन पिंडदान बुकिंग पर भड़के गयावाल पंडा, आंदोलन की चेतावनी

श्री विष्णुपद प्रबंधकारिणी समिति के सचिव गजाधर लाल पाठक और वरिष्ठ पुरोहितों का कहना है कि वेदों और शास्त्रों में ऑनलाइन पिंडदान का कोई प्रमाण नहीं है। बिना गयाजी आए और अक्षय वट के नीचे 'सुफल' प्राप्त किए बिना गया श्राद्ध अधूरा है।

gayaji tirth purohit oppose online pind Daan package system
गयाजी में ऑनलाइन पिंडदान के विरोध के स्वर मुखर- फोटो : Reporter

मोक्षस्थली के रूप में चर्चित बिहार के गयाजी में पितृपक्ष के दौरान ऑनलाइन पिंडदान और पिंडदान के नाम पर संचालित पैकेज व्यवस्था को लेकर गयापाल तीर्थ पुरोहितों ने विरोध तेज कर दिया है। तीर्थ पुरोहितों का कहना है कि पिंडदान सनातन परंपरा और शास्त्र-सम्मत धार्मिक विधान है, जिसे ऑनलाइन माध्यम, होटल या अन्य संस्थाओं के पैकेज के जरिए कराना उचित नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऑनलाइन पिंडदान के नाम पर तीर्थयात्रियों से ठगी की जा रही है।

मीडिया से बातचीत में श्री विष्णुपद प्रबंधकारिणी समिति के सचिव गजाधर लाल पाठक ने भी ऑनलाइन पिंडदान और पैकेज व्यवस्था का विरोध किया। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन पिंडदान की व्यवस्था का धार्मिक ग्रंथों, वेदों और शास्त्रों में कोई प्रमाण नहीं है। उन्होंने बताया कि वह पिछले कई वर्षों से ऑनलाइन पिंडदान का विरोध करते आ रहे हैं। नारायण सवद सेवक गयापाल पंडा दीपू जी भैया ने कहा कि पिंडदान पूरी तरह वैदिक परंपरा से जुड़ा धार्मिक विधान है और इसे ऑनलाइन माध्यम से पूरा नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि गयाजी आने वाले पिंडदानियों के लिए यहां की धार्मिक प्रक्रिया में ‘सुफल’ का विशेष महत्व है। परंपरा के अनुसार गया श्राद्ध और पिंडदान की प्रक्रिया के बाद अक्षय वट के नीचे गयावाल तीर्थ पुरोहित द्वारा श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया जाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब श्रद्धालु गयाजी आएंगे ही नहीं, तो उन्हें यहां की परंपरा के अनुसार ‘सुफल’ कैसे प्राप्त होगा। उन्होंने कहा कि किसी अन्य माध्यम या ऑनलाइन व्यवस्था के जरिए गया श्राद्ध की धार्मिक प्रक्रिया पूरी होने की बात मानना उचित नहीं है।

दीपूजी भैया ने कहा कि गयावाल तीर्थ पुरोहितों का अपने तीर्थयात्रियों से दादा-परदादा के समय से संबंध रहा है। कई परिवारों की पीढ़ियां गयाजी आकर उन्हीं पुरोहितों के माध्यम से पिंडदान करती रही हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे में बाहरी लोगों द्वारा गलत तरीके या गलत स्थान पर पिंडदान कराने से श्रद्धालुओं में भ्रम पैदा होता है और इसका असर पारंपरिक गयापाल व्यवस्था की छवि पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा को केवल औपचारिकता या पैकेज में बदलना उचित नहीं है। सरकार और श्रद्धालुओं को भी इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

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वहीं, वरिष्ठ गयापाल राजन सिजुआर ने कहा कि गयाजी में पिंडदान की परंपरा सनातन काल से तीर्थ पुरोहितों से जुड़ी रही है। गया आने वाले पिंडदानी फल्गु नदी में तर्पण और पितरों का आह्वान करने के बाद विभिन्न वेदियों पर पिंडदान की परंपरा निभाते हैं। ऐसे में होटल, मंदिर परिसर या अन्य स्थानों पर पैकेज के आधार पर पिंडदान कराने की व्यवस्था पारंपरिक तीर्थ व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने कहा कि पितृपक्ष के दौरान कई वेबसाइटों पर ऑनलाइन पिंडदान के विज्ञापन और बुकिंग की पेशकश की जा रही है। कहीं कम कीमत में पिंडदान कराने का दावा किया जा रहा है तो कहीं अलग-अलग राशि के पैकेज उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि गयाजी का पिंडदान कोई पर्यटन पैकेज नहीं, बल्कि आस्था और धार्मिक परंपरा से जुड़ा विधान है। राजन सिजुआर ने पर्यटन विभाग से ऑनलाइन पिंडदान और पैकेज आधारित व्यवस्थाओं पर पुनर्विचार करने की मांग की। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन पिंडदान के नाम पर श्रद्धालुओं से किसी प्रकार की ठगी नहीं होने दी जाएगी। गयापाल तीर्थ पुरोहितों ने कहा कि ऑनलाइन पिंडदान की बुकिंग और पैकेज व्यवस्था बंद नहीं हुई तो वे अपनी वृत्ति और पारंपरिक व्यवस्था की रक्षा के लिए सामूहिक आंदोलन की रणनीति तैयार करेंगे।