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कभी सिर लेकर थाने पहुंचा, फिर बना नेता,कातिल से नेता तक का सफर और फिर अंत, पढ़िए रामधनी यादव की खूनी कहानी

Bhagalpur encounter case: एक ऐसा नाम, जिससे इलाके में खौफ की हुकूमत चलती थी रामधनी यादव अब सिर्फ एक फाइल बनकर रह गया है। लेकिन उसके खात्मे की कहानी… एक सीधा-सादा एनकाउंटर नहीं, बल्कि पूरा का पूरा क्राइम ड्रामा है...

From killer to politician then end Ramdhani Yadav bloody ris
रामधनी यादव की खूनी कहानी- फोटो : social Media

Bhagalpur encounter case:भागलपुर के सुल्तानगंज से उठी गोलियों की गूंज अब पूरे बिहार में सियासी तूफान बन चुकी है। एक ऐसा नाम, जिससे इलाके में खौफ की हुकूमत चलती थी रामधनी यादव अब सिर्फ एक फाइल बनकर रह गया है। लेकिन उसके खात्मे की कहानी… एक सीधा-सादा एनकाउंटर नहीं, बल्कि पूरा का पूरा क्राइम ड्रामा है, जिसमें सियासत, सत्ता, अदावत और खून का खेल एक साथ खुलकर सामने आता है।

दफ्तर में घुसा… और बरसाई गोलियां

मंगलवार की शाम, सुल्तानगंज नगर परिषद कार्यालय… माहौल था टेंडर और ठेके की बोली का। चेयरमैन राजकुमार उर्फ गुड्डू के कमरे में 12-15 लोग मौजूद थे। तभी अचानक दरवाजा खुलता है… सफेद शर्ट, खाकी हाफ पैंट और हरे झोले के साथ एंट्री होती है रामधनी यादव की। कमरे में सन्नाटा… और फिर रामधनी का डायलॉग सुल्तानगंज में सिर्फ तुम ही राज करोगे क्या…? इसके बाद जो हुआ, वो किसी फिल्मी सीन से कम नहीं था। झोले से कट्टा निकला… और शुरू हो गई फायरिंग। चेयरमैन को दो गोलियां लगीं… अफरा-तफरी मच गई। बीच-बचाव करने पहुंचे एग्जीक्यूटिव अफसर कृष्ण भूषण कुमार भी रामधनी के निशाने पर आ गए… और एक गोली ने उनकी जिंदगी खत्म कर दी। पूरा मंजर CCTV में कैद हो चुका था… और यहीं से शुरू हुआ पुलिस का शिकंजा।

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सरेंडर से साजिश तक…

वारदात के कुछ घंटे बाद ही, जब पुलिस का दबाव बढ़ा… तो रामधनी यादव खुद ऑटो से थाना पहुंच गया। सरेंडर कर दिया। लेकिन यह सिर्फ कहानी का एक मोड़ था… असली खेल अभी बाकी था।पुलिस को हथियार चाहिए था… और रामधनी बार-बार सवालों को घुमा रहा था। आखिरकार उसने बताया कि हथियार सुनसान इलाके में छिपाया गया है। पुलिस उसे लेकर निकलती है… लेकिन उसे अंदाजा था—अगर हथियार मिल गया, तो बचना मुश्किल है।

घात, गद्दारी और गोली…

जैसे ही पुलिस टीम उस सुनसान जगह पहुंची… खेल पलट गया। पीछे-पीछे चल रहे रामधनी के गुर्गे अचानक एक्टिव हो गए। इशारा मिला… और शुरू हो गई फायरिंग।रामधनी खुद भी छिपाई हुई पिस्टल निकालता है… और पुलिस पर गोलियां बरसाने लगता है। गोलियों की बौछार में DSP नवीन, इंस्पेक्टर परमेश्वर और इंस्पेक्टर मृत्यंजय घायल हो जाते हैं।लेकिन इस बार पुलिस तैयार थी… जवाबी कार्रवाई हुई… और एक गोली सीधे रामधनी के सीने में जा धंसी।खौफ का बादशाह… वहीं जमीन पर गिर पड़ा।उसे आनन-फानन में मायागंज अस्पताल ले जाया गया… लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

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कौन था रामधनी?

रामधनी यादव… एक ऐसा नाम, जिसकी शुरुआत दूध बेचने से हुई… लेकिन अंत खून-खराबे में हुआ।साल 2000 में एक कारोबारी की हत्या… सिर काटकर थाने पहुंचना… जेल… फिर जमानत… और फिर अपराध की दुनिया में वापसी।2002-03 तक हत्या, लूट, रंगदारी के कई केस…फिर राजनीति से नजदीकी…पत्नी नीलम देवी को पार्षद बनवाना… फिर डिप्टी चेयरमैन की कुर्सी…और खुद बन गया सुल्तानगंज का अनौपचारिक शासक।घाट, पार्किंग, बस स्टैंड… हर जगह उसका सिक्का चलता था। करोड़ों की संपत्ति… नेताओं से रिश्ते… और जमीन पर खौफ का राज।

अदावत की आग…

लेकिन इस कहानी में एक और किरदार था—कनबुच्चा यादव।दोनों के बीच सालों पुरानी दुश्मनी…2023 में जानलेवा हमले…नगर परिषद की सत्ता पर कब्जे की जंग…कहते हैं… पिछले कुछ महीनों में रामधनी का तिलिस्म टूटने लगा था। कमाई के रास्ते बंद… राजनीतिक पकड़ कमजोर… और यहीं से शुरू हुआ उसका आखिरी खेल।

गेम रूल बदल गया?

12 घंटे के अंदर एनकाउंटर… सख्त पुलिस एक्शन…सियासत में बयानबाजी…किसी ने कहा कानून का राज…तो किसी ने कहा एनकाउंटर कल्चर। लेकिन सुल्तानगंज की सड़कों पर एक ही चर्चा है अब खेल बदल गया है…रामधनी यादव की कहानी सिर्फ एक अपराधी के खात्मे की नहीं…ये उस सिस्टम की कहानी है, जहां अपराध, सत्ता और सियासत का गठजोड़ बनता है… और फिर एक दिन गोलियों में खत्म हो जाता है।लेकिन सवाल अभी भी जिंदा है क्या ये अंत है… या किसी नए रामधनी की शुरुआत?