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खटिया पर सुशासन की अर्थी! भागलपुर में 20 KM तक मरीज को खाट पर ढोते रहे ग्रामीण, 17 साल से सड़क को तरस रहा गाँव!

क्या यही है चमचमाता बिहार? भागलपुर के नवगछिया में जब एक घायल महिला को इलाज की जरूरत पड़ी, तो एंबुलेंस नहीं बल्कि 'खटिया' मिली। 20 किलोमीटर तक ग्रामीणों ने मरीज को कंधे पर ढोया। दावों के बीच सिसकती डीमहा पंचायत की यह खौफनाक हकीकत प्रशासन को आईना दिखा

खटिया पर सुशासन की अर्थी! भागलपुर में 20 KM तक मरीज को खाट प

Bhagalpur - भागलपुर के नवगछिया से आई यह हृदयविदारक तस्वीर बिहार के स्वास्थ्य और सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर के दावों की पोल खोलती है। गोपालपुर प्रखंड की डीमहा पंचायत में आज भी हालात इतने बदतर हैं कि किसी आपातकालीन स्थिति में एंबुलेंस गाँव तक नहीं पहुँच पाती। हाल ही में एक महिला के सीढ़ी से गिरकर घायल होने के बाद ग्रामीणों को उसे खाट पर लादकर मीलों पैदल चलने को मजबूर होना पड़ा। 

खटिया बनी मजबूरी की एंबुलेंस

घटना डीमहा पंचायत के दर्शन पंडित के परिवार से जुड़ी है, जहाँ उनकी पत्नी अनीता देवी छत पर चढ़ने के दौरान संतुलन बिगड़ने से गिर गईं और गंभीर रूप से घायल हो गईं। स्थानीय ग्रामीण चिकित्सक ने जब उनकी हालत नाजुक बताई और अस्पताल ले जाने की सलाह दी, तो परिवार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई। गाँव तक सड़क का नामोनिशान नहीं होने के कारण ग्रामीणों ने अनीता को खाट पर लेटाया और हाथ में सलाइन की बोतल लेकर पैदल ही निकल पड़े। 

20 किलोमीटर का कठिन सफर

घायल महिला को उचित इलाज दिलाने के लिए ग्रामीणों ने उसे खटिया पर कंधे के सहारे उठाया और करीब 20 किलोमीटर का लंबा सफर तय किया। एंबुलेंस की सुविधा न मिलने के कारण भीषण दर्द से तड़पती महिला को इसी आदिम तरीके से गोपालपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुँचाया गया। यह दृश्य न केवल मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने वाला था, बल्कि स्थानीय प्रशासन की विफलता का जीता-जागता सबूत भी था। 

17 वर्षों से विकास की बाट जोहता गाँव

महिला के भतीजे मिथलेश ने बताया कि पिछले 17 वर्षों से इस पंचायत में एक भी पक्की सड़क का निर्माण नहीं हुआ है। सड़क की जर्जर स्थिति या अनुपलब्धता के कारण एंबुलेंस चालक गाँव के भीतर आने से साफ मना कर देते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे बुनियादी सुविधाओं जैसे अस्पताल, स्कूल और सड़क के लिए दशकों से तरस रहे हैं और बीमार पड़ने पर केवल 'भगवान' ही उनका सहारा होते हैं। 

900 की आबादी और प्रशासनिक उपेक्षा

डीमहा पंचायत में 900 से अधिक लोग निवास करते हैं, लेकिन इतनी बड़ी आबादी आज भी बुनियादी ढांचे के अभाव में जी रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि जनप्रतिनिधि केवल चुनावों के दौरान ही गाँव का रुख करते हैं और वादों के साथ वोट लेकर गायब हो जाते हैं। रात के समय किसी के गंभीर बीमार पड़ने पर स्थिति और भी भयावह हो जाती है, क्योंकि वाहन न पहुँच पाने के कारण समय पर इलाज न मिलना जानलेवा साबित हो सकता है। 

सुशासन के दावों पर सवाल

'सुशासन' के नाम पर वोट देने वाले इन ग्रामीणों का अब व्यवस्था से भरोसा उठने लगा है। स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क जैसे तीनों महत्वपूर्ण मोर्चों पर इस गाँव की उपेक्षा शासन की बड़ी नाकामी मानी जा रही है। डीमहा की यह तस्वीर सवाल खड़ा करती है कि क्या आधुनिक भारत में आज भी विकास केवल कागजों तक ही सीमित है, या फिर जिम्मेदार अधिकारी इस घटना के बाद अपनी नींद से जागेंगे?

Report - anjanee kumar kashyap