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Prashant Kishore: बिहार यात्रा पर आज से निकलेंगे प्रशांत किशोर, पश्चिम चंपारण की पिच से शुरु होगा राजनीतिक आत्ममंथन

Prashant Kishore: चुनावी मैदान में करारी हार के बाद राजनीतिक रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर एक बार फिर बिहार यात्रा पर निकल पड़े हैं।

Prashant Kishor Begins Bihar Tour Introspection from West Ch
बिहार यात्रा पर आज से निकलेंगे प्रशांत किशोर- फोटो : social Media

Prashant Kishore: बिहार की सियासत में एक बार फिर हलचल तेज होने वाली है। चुनावी मैदान में करारी हार के बाद राजनीतिक रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर एक बार फिर बिहार यात्रा पर निकल पड़े हैं। 8 फरवरी से शुरू हो रही यह राज्यव्यापी यात्रा सिर्फ सियासी दौरा नहीं, बल्कि जनता के दरबार में पेश होने और खुद से सवाल-जवाब करने की कोशिश मानी जा रही है। 2025 के विधानसभा चुनाव में अपेक्षित सफलता न मिलने के बाद यह यात्रा जन सुराज पार्टी के लिए संजीवनी की तरह देखी जा रही है।

प्रशांत किशोर ऐसे वक्त में मैदान में उतर रहे हैं, जब बिहार की राजनीति सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए इम्तिहान बन चुकी है। बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे आज भी जनता के ज़हन में सुलगते सवाल हैं। पीके का कहना है कि चुनावी नतीजों ने आईना दिखाया है और अब ज़रूरत है जनता की नब्ज़ टटोलने की। इसी मकसद से वे जिलों की खाक छानेंगे और सीधे आम लोगों से रूबरू होंगे।इस यात्रा का पहला पड़ाव पश्चिम चंपारण होगा। इसके बाद पूर्वी चंपारण, दरभंगा, मुजफ्फरपुर और वैशाली जैसे जिलों में जन सुराज के सिपाहियों और स्थानीय अवाम से मुलाकात होगी। हर जिले में संगठनात्मक बैठकों के जरिए पार्टी की जमीनी हकीकत का जायजा लिया जाएगा। अंदरखाने की बात यह है कि चुनाव के बाद पार्टी के कई कार्यकर्ता मायूस हो गए थे। ऐसे में खुद पार्टी मुखिया का मैदान में उतरना, मनोबल बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है।

प्रशांत किशोर इस यात्रा के जरिए यह संदेश देना चाहते हैं कि हार सियासी सफर का आखिरी पड़ाव नहीं होती, बल्कि नई रणनीति गढ़ने का मौका होती है। वे गांवों, कस्बों और जिला मुख्यालयों पर जनता से सवाल पूछेंगे रोजगार कहां अटका है, पढ़ाई क्यों पिछड़ रही है और स्वास्थ्य व्यवस्था क्यों कराह रही है।

खास फोकस युवाओं पर रहेगा। रोजगार और भविष्य को लेकर युवाओं की बेचैनी को पीके लंबे समय से बिहार की सबसे बड़ी चुनौती बताते आए हैं। उनका मानना है कि जब तक अवसरों की सियासत नहीं बदलेगी, पलायन का सिलसिला नहीं थमेगा।यह बिहार यात्रा एक तरह से राजनीतिक आत्ममंथन भी है। प्रशांत किशोर खुलकर मान चुके हैं कि चुनावी रणनीति और संगठन, दोनों मोर्चों पर उनसे चूक हुई। अब देखना यह है कि यह यात्रा सियासत की बिसात पर जन सुराज को नई चाल चलने का मौका देती है या नहीं।

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