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Bharat Bhushan Tiwari Encounter: 29 एनकाउंटर, 8 मौतें और कई सवाल, भरत तिवारी केस ने खोली बिहार पुलिस की पोल, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से बढ़ी खाकी की मुश्किलें, मुठभेड़ की गोली,गवाही और गाइडलाइन पर इनसाइड स्टोरी

Bharat Bhushan Tiwari Encounter:जिस मुठभेड़ को पुलिस ने अपनी कामयाबी बताकर पेश किया था, उसी पर अब फर्जी एनकाउंटर का साया मंडरा रहा है। मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गया है।सवाल है क्या पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज होगा?

Encounter or Killing Bharat Tiwari Case Reaches Supreme Cour
भरत भूषण तिवारी का एनकाउंटर या कत्ल?- फोटो : social Media

Bharat Bhushan Tiwari Encounter:  भोजपुर के भरत भूषण तिवारी के कथित एनकाउंटर का मामला अब सियासी और कानूनी गलियारों में बड़ा तूफान बन चुका है। जिस मुठभेड़ को पुलिस ने अपनी कामयाबी बताकर पेश किया था, उसी पर अब फर्जी एनकाउंटर का साया मंडरा रहा है। मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गया है। वरिष्ठ अधिवक्ता विशाल तिवारी और नरेंद्र मिश्रा ने जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि भरत भूषण तिवारी की मौत कोई वास्तविक मुठभेड़ नहीं बल्कि सुनियोजित पुलिसिया कार्रवाई हो सकती है। यही वजह है कि स्थानीय पुलिस की जांच पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि एनकाउंटर में भोजपुर पुलिस और एसटीएफ खुद शामिल थीं। ऐसे में जांच की सुई उन्हीं हाथों में सौंपने को लेकर गंभीर आपत्तियां उठाई जा रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट के पास हैं असाधारण शक्तियां

संविधान ने सुप्रीम कोर्ट को ऐसे मामलों में व्यापक अधिकार दिए हैं। अदालत चाहे तो पूरे मामले की निगरानी स्वयं कर सकती है, सीबीआई जांच का आदेश दे सकती है या किसी दूसरे राज्य की स्वतंत्र एसआईटी गठित कर सकती है। हालांकि बढ़ते जनदबाव और मीडिया की आलोचना के बाद सम्राट सरकार ने पटना हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में न्यायिक जांच का आदेश दे दिया है।

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लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल जांच समिति बना देना पर्याप्त है? क्योंकि अब तक एनकाउंटर में शामिल किसी पुलिस अधिकारी के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज नहीं हुई है। भरत की मां द्वारा हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग किए जाने के बावजूद पुलिस ने कोई आपराधिक केस नहीं लिखा।

क्या पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज होगा?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रथम दृष्टया एनकाउंटर संदिग्ध पाया जाता है तो अदालत सीधे संबंधित पुलिसकर्मियों, कमांडिंग ऑफिसर और डीएसपी के खिलाफ हत्या की एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे सकती है। इसके अलावा मुठभेड़ में इस्तेमाल हथियारों को जब्त कर बैलिस्टिक और फॉरेंसिक जांच कराना भी जरूरी माना जाता है, ताकि यह पता चल सके कि गोलियां कितनी दूरी से और किन परिस्थितियों में चलाई गईं।

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पीड़ित परिवार को अंतरिम मुआवजा और सुरक्षा देने का आदेश भी अदालत के अधिकार क्षेत्र में आता है। परिवार का आरोप है कि वे लगातार दबाव और भय के माहौल में जी रहे हैं।

7 महीने में 29 एनकाउंटर, लेकिन गाइडलाइन का पालन नहीं

बीते सात महीनों के आंकड़े बिहार पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। 20 नवंबर 2025 से अब तक राज्य में 29 पुलिस मुठभेड़ें हुईं, जिनमें 8 लोगों की मौत हुई। आरोप है कि किसी भी मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय प्रक्रिया का पूरी तरह पालन नहीं किया गया। न तो स्वतंत्र एजेंसी द्वारा जांच हुई और न ही संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ अनिवार्य एफआईआर दर्ज की गई। यही वजह है कि भरत भूषण तिवारी का मामला अब व्यापक बहस का विषय बन गया है।

बिहार में पहले भी उठते रहे हैं सवाल

बिहार में एनकाउंटरों को लेकर विवाद कोई नया नहीं है। 2002 के चर्चित पटना छात्र एनकाउंटर में तीन निर्दोष छात्रों को डकैत बताकर मार गिराया गया था। बाद की जांच में खुलासा हुआ कि पदक और प्रशंसा पाने की लालसा में यह कार्रवाई की गई थी।

इसी तरह गया के बाराचट्टी हत्याकांड में पुलिस ने आत्मरक्षा में गोली चलाने का दावा किया था, लेकिन जांच में जबरन वसूली के लिए हत्या किए जाने की बात सामने आई। निचली अदालत ने कई पुलिसकर्मियों को मौत की सजा तक सुनाई थी।

वहीं 2025 में नोनपुर गांव में माओवादी दयानंद मलाकार के एनकाउंटर पर भी विपक्ष और परिवार ने गंभीर सवाल उठाए थे। आरोप लगा था कि उसे घर में घुसकर मारा गया, लेकिन मामला जांच की मंजिल तक नहीं पहुंच सका।

सुप्रीम कोर्ट की 16 सूत्रीय गाइडलाइन क्या कहती है?

साल 2014 में पुचेल बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस एनकाउंटरों को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। अदालत ने स्पष्ट कहा था कि किसी भी मुठभेड़ में मौत होने पर तत्काल एफआईआर दर्ज होगी और जांच उसी थाने की पुलिस नहीं करेगी।

अदालत ने मजिस्ट्रेट जांच, हथियारों की फॉरेंसिक जांच, पोस्टमार्टम की वीडियो रिकॉर्डिंग, मानवाधिकार आयोग को सूचना, सबूतों के संरक्षण और पीड़ित परिवार को जानकारी देने जैसी कई अनिवार्य शर्तें तय की थीं। यदि जांच में मुठभेड़ फर्जी पाई जाती है तो संबंधित पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा चलाया जाना चाहिए।

हैदराबाद एनकाउंटर- जब तालियों के बाद दर्ज हुई हत्या की एफआईआर

याद कीजिए 2019 केा चर्चित हैदराबाद एनकाउंटर के, जिसमें पुलिस ने महिला डॉक्टर से गैंगरेप और हत्या के आरोपियों को मार गिराया था। शुरुआत में जनता ने पुलिस की सराहना की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित जस्टिस वी.एस. सिरपुरकर आयोग ने अपनी रिपोर्ट में पुलिस की कहानी को झूठा करार दिया।रिपोर्ट में कहा गया कि आरोपियों को जानबूझकर गोली मारी गई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 10 पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या और सबूत मिटाने का मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया गया।

अब सुप्रीम कोर्ट की निगाहें टिकीं

भरत भूषण तिवारी प्रकरण अब केवल एक एनकाउंटर की कहानी नहीं रह गया है। यह सवाल कानून के राज, पुलिस जवाबदेही और नागरिक अधिकारों का बन चुका है। यदि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सख्त रुख अपनाता है तो बिहार में एनकाउंटर की संस्कृति और पुलिस जांच की प्रक्रिया पर दूरगामी असर पड़ सकता है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है क्या यह सचमुच पुलिस और अपराधी के बीच हुई मुठभेड़ थी, या फिर किसी को हमेशा के लिए खामोश कर देने की एक सुनियोजित कहानी? इसका जवाब अब अदालत और जांच एजेंसियों की रिपोर्ट ही दे पाएगी।