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Bharat Tiwari Encounter: भरत एनकाउंटर पर बढ़ता सस्पेंस, सवालों से घिरे पुलिसिया एक्शन पर CM की चुप्पी, फर्जी मुठभेड़ की बहस हुई और तेज, अब सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग की चौखट पर पहुंचा मामला

Bharat Tiwari Encounter: भोजपुर के बिलौटी गांव में भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर को लेकर जिस पुलिसिया कार्रवाई को शुरुआत में अपराध के खिलाफ बड़ी सफलता के रूप में पेश किया गया था, वही अब विवाद, आरोप-प्रत्यारोप और जांच के घेरे में आ गई है।...

Bhojpur Encounter on CM silence
भरत एनकाउंटर पर बढ़ता सस्पेंस- फोटो : social Media

Bharat Tiwari Encounter: भोजपुर के बिलौटी गांव में भरत तिवारी एनकाउंटर को लेकर उठे सवाल थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। जिस पुलिसिया कार्रवाई को अपराध के खिलाफ बड़ी कामयाबी बताया गया था, वही अब विवादों, आरोपों और जांच के घेरे में आ चुकी है। परिजनों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि भरत तिवारी ने कथित तौर पर सरेंडर कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद उसे चार गोलियां मारी गईं। यही आरोप अब पूरे मामले को सनसनीखेज मोड़ दे रहा है।एनकाउंटर के बाद पुलिस की कार्यशैली पर लगातार उंगलियां उठ रही हैं। हालात इतने गंभीर हो गए कि मामले में लापरवाही बरतने के आरोप में पांच पुलिसकर्मियों को निलंबित करना पड़ा। पुलिस मुख्यालय की इस कार्रवाई ने यह साफ संकेत दिया कि घटनाक्रम में कुछ ऐसे पहलू हैं जिनकी गहन जांच जरूरी है।

इसी बीच आज यानी मंगलवार को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से जब पत्रकारों ने इस चर्चित एनकाउंटर को लेकर सवाल पूछा, तो माहौल और गर्म हो गया। पत्रकारों ने पूछा कि विपक्ष ही नहीं, बल्कि भाजपा के कुछ नेताओं की ओर से भी इसे कथित फर्जी एनकाउंटर बताया जा रहा है। लोग जवाब चाहते हैं कि आखिर उस रात क्या हुआ था और किन परिस्थितियों में भरत तिवारी की मौत हुई।हालांकि सवालों की बौछार के बावजूद मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वह श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस कार्यक्रम में भाजपा कार्यालय पहुंचे थे। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जब पत्रकारों ने बार-बार भरत एनकाउंटर पर सवाल दागे, तब भी उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और सीधे अपनी गाड़ी में बैठकर रवाना हो गए। मुख्यमंत्री की यह खामोशी अब नई चर्चाओं को जन्म दे रही है। राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर सरकार इस मामले पर खुलकर बोलने से क्यों बच रही है। दूसरी ओर मृतक के परिजन निष्पक्ष जांच की मांग पर अड़े हुए हैं और पूरे घटनाक्रम को संदिग्ध बता रहे हैं।

बता दें भोजपुर के बिलौटी गांव में 17 जून को हुए भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर का मामला अब एक साधारण पुलिस कार्रवाई से निकलकर बड़े कानूनी और सियासी विवाद का रूप ले चुका है। जिस मुठभेड़ को पुलिस अपराध के खिलाफ कार्रवाई बता रही थी, उसी पर अब सवालों की ऐसी बौछार हो रही है कि पूरा मामला जांच एजेंसियों, मानवाधिकार आयोग और अदालतों की निगाह में आ गया है।एनकाउंटर के बाद से मृतक के परिजन लगातार पुलिस पर गंभीर इल्जाम लगा रहे हैं। उनका दावा है कि भरत तिवारी ने सरेंडर कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद उसे चार गोलियां मारी गईं। इसी आरोप ने पूरे घटनाक्रम को शक और सस्पेंस के घेरे में ला खड़ा किया है। गांव से लेकर राजनीतिक गलियारों तक यह चर्चा तेज है कि आखिर उस रात सच क्या हुआ था।

मामले में पहली बड़ी कार्रवाई तब हुई जब पुलिस मुख्यालय ने लापरवाही के आरोप में पांच पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया। इनमें राजेश कुमार मालाकार, अंकित आर्यन, हरिश्चंद्र कुमार, रामाशंकर यादव और महिला सिपाही मीरा कुमारी शामिल हैं। इस कार्रवाई ने यह संकेत जरूर दिया कि पुलिस विभाग भी मामले को हल्के में नहीं ले रहा। सबसे अहम बात यह रही कि एडीजी (लॉ एंड ऑर्डर) सुधांशु कुमार ने सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया कि कार्रवाई के दौरान पुलिस स्तर पर चूक हुई थी। उन्होंने कहा कि 16 जून को भरत तिवारी से बातचीत करने पहुंची टीम उसे सही तरीके से हैंडल नहीं कर सकी। इसी लापरवाही के आधार पर संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई की गई।

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उधर, बिहार राज्य मानवाधिकार आयोग ने भी मामले का संज्ञान लेते हुए बिहार के मुख्य सचिव, डीजीपी और भोजपुर एसपी को तलब किया है। आयोग ने चार सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है और 13 जुलाई को मामले की समीक्षा करेगा। इससे साफ है कि अब जांच का दायरा और गहरा होने वाला है।

इसी बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने न्यायिक जांच के आदेश देने की घोषणा की थी। हालांकि अभी तक रिटायर्ड हाईकोर्ट जज की नियुक्ति को लेकर कोई आधिकारिक स्पष्टता सामने नहीं आई है। मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। जनहित याचिका के जरिए निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग उठाई गई है। फिलहाल अदालत ने तत्काल सुनवाई से इनकार करते हुए नियमानुसार मामले को सूचीबद्ध कराने का निर्देश दिया है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि भरत तिवारी की मौत एक वैध पुलिस कार्रवाई थी या फिर उन आरोपों में दम है जो लगातार उठ रहे हैं। जवाब जांच, सबूत और अदालत की प्रक्रिया से ही सामने आएगा, लेकिन फिलहाल यह मामला बिहार की कानून-व्यवस्था और पुलिस कार्यप्रणाली पर गंभीर बहस का केंद्र बन चुका है।