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High Court: होटल में पति-पत्नी की तरह रहे, तो क्या यह रेप है? हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- आपसी सहमति को आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता

High Court: यौन अपराधों की दलीलों और सहमति के सपने पर एक अहम और नजीर कायम करने वाला फैसला हाई कोर्ट ने सुनाया है........

Lived as Husband Wife  Is It Rape HC Rules
होटल में पति-पत्नी की तरह रहे, तो क्या यह रेप है?- फोटो : social Media

High Court: यौन अपराधों की दलीलों और सहमति के सपने पर एक अहम और नजीर कायम करने वाला फैसला सुनाते हुए  कोलकता हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी रिश्ते में बाद में कड़वाहट आ जाए या शादी मुकम्मल न हो पाए, तो मात्र इस आधार पर पूर्व में बने आपसी सहमति के शारीरिक संबंधों को बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

 न्यायमूर्ति चैताली चटर्जी  की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि धारा 376 के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए यह आवश्यक है कि अभियोजन यह प्रदर्शित करे कि संबंध की शुरुआत से ही आरोपी का इरादा धोखाधड़ी का था अर्थात उसने शादी का झूठा वादा केवल यौन संबंध बनाने के उद्देश्य से किया हो। यदि प्रारंभिक अवस्था में कपटपूर्ण मंशा सिद्ध नहीं होती, तो बाद में संबंध टूट जाने मात्र से सहमति का स्वरूप आपराधिक नहीं हो जाता।

अदालत के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों के अनुसार, दोनों वयस्कों के बीच वर्ष 2017 से 2022 तक संबंध कायम रहा। इस दौरान वे दीघा, पार्क स्ट्रीट, खड़गपुर और गोवा जैसे स्थानों पर साथ ठहरे, होटल में रहे और पति-पत्नी की भांति जीवन व्यतीत किया। न्यायालय ने यह भी संज्ञान में लिया कि महिला गर्भवती हुईं और दोनों पक्षों की सहमति से गर्भपात कराया गया।

पीठ ने कहा कि यदि वास्तव में धोखे या जबरन उकसावे का तत्व मौजूद होता, तो पीड़िता तत्काल या समुचित समय पर शिकायत दर्ज करातीं। किन्तु रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि संबंध कई वर्षों तक स्वेच्छा से चलता रहा। अदालत ने टिप्पणी की कि “सिर्फ इसलिए कि वादा-ए-शादी पूरा नहीं हुआ, आपसी सहमति को आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता।”

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मामले में महिला ने वर्ष 2022 में पश्चिम मिदनापुर में प्राथमिकी दर्ज कराई थी, जिसके पश्चात आरोपी की गिरफ्तारी हुई। हालांकि, हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और व्यवहारिक परिस्थितियों के आधार पर आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।

यह फैसला सहमति  और कपटपूर्ण प्रलोभन  के बीच महीन लेकिन अहम अंतर को रेखांकित करता है। अदालत ने दोहराया कि आपराधिक न्याय प्रणाली में भावनात्मक विफलता और विधिक अपराध को अलग-अलग कसौटी पर परखा जाना चाहिए। कानून का पैगाम साफ है रिश्ते का अंत अपने आप में जुर्म नहीं, जब तक कि शुरुआत ही फरेब और दुर्भावना से न हुई हो।