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West Bengal political crisis: ममता के खेला होबे का गणित पड़ गया उल्टा, पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन का काउंटडाउन शुरू! इस कारण सियासत बनाम संविधान की जंग हो गई है तेज

West Bengal political crisis: पश्चिम बंगाल की सियासत में “खेला होबे” का नारा एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार सियासी समीकरण उलझते दिख रहे हैं।...

Mamata Banerjee Backfires Bengal Faces President Rule Buzz
ममता के खेला होबे का गणित पड़ गया उल्टा- फोटो : social Media

West Bengal political crisis: पश्चिम बंगाल की सियासत इन दिनों उबाल पर है। कभी “खेला होबे” के नारों से गूंजने वाला बंगाल अब संवैधानिक गणित और वक्त की सख्त मियाद में उलझता दिखाई दे रहा है। दावे किए जा रहे हैं कि अगर समय रहते स्पेशल इंटेंसिव रिविजन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई, तो 7 मई 2026 के बाद हालात ऐसे बन सकते हैं जहां राष्ट्रपति शासन लागू करना संवैधानिक मजबूरी बन जाए और यह कदम थोपा हुआ नहीं, बल्कि प्रावधानों के तहत स्वतः प्रभावी होगा। पश्चिम बंगाल की सियासत में “खेला होबे” का नारा एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार सियासी समीकरण उलझते दिख रहे हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार पर विपक्ष का हमला तेज है और राजनीतिक गलियारों में राष्ट्रपति शासन को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है।

हालांकि, यह समझना ज़रूरी है कि भारत में किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करना एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जो केवल ठोस परिस्थितियों जैसे कानून-व्यवस्था की गंभीर विफलता या सरकार के बहुमत खोने पर आधारित होती है। इसका अंतिम निर्णय केंद्र सरकार की सिफारिश और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही संभव होता है।मौजूदा हालात में आरोप-प्रत्यारोप की सियासत जरूर गरमाई है, लेकिन आधिकारिक तौर पर राष्ट्रपति शासन की कोई घोषणा नहीं हुई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि “सियासत बनाम संविधान” की बहस अक्सर राजनीतिक बयानबाजी में उछलती है, पर वास्तविक कदम तथ्यों और संवैधानिक प्रावधानों पर निर्भर करते हैं।

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जानकारी के मुताबिक 7 मई 2026 को विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। संविधान साफ कहता है कि तय तारीख तक नई सरकार का गठन न हो सके, तो मौजूदा सरकार का वजूद खत्म माना जाएगा। चुनाव प्रक्रिया में अधिसूचना, नामांकन, बहु-चरणीय मतदान और मतगणना  सब मिलाकर कम से कम 35 से 40 दिन का वक्त लगता है। अगर मार्च की शुरुआत तक चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं होता, तो मई से पहले नई हुकूमत का गठन मुश्किल हो सकता है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी  ने स्पेशल इंटेंसिव रिविजन को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया है। विपक्ष इसे सियासी चूक बता रहा है और कह रहा है कि न्यायिक पेचिदगियां समयसीमा पर भारी पड़ सकती हैं। उधर विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह फिलहाल “वेट एंड वॉच” की नीति पर हैं आक्रामक कदम उठाने के बजाय वक्त को अपना काम करने दिया जा रहा है।

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बहस ‘फ्रीबी बनाम प्रक्रिया’ पर भी छिड़ी है। लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं को लेकर विपक्ष चुनावी दांव बता रहा है, जबकि तृणमूल कांग्रेस अपने जनाधार पर भरोसा जता रही है। बंगाल में आम तौर पर 7-8 चरणों में मतदान होता है, हर चरण के बीच अंतराल के साथ पूरी प्रक्रिया लंबी खिंचती है।अब निगाहें भारत का चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की आगामी कार्यवाही पर टिकी हैं। अगर मार्च में कार्यक्रम घोषित हुआ तो सियासी तस्वीर साफ हो सकती है, वरना 7 मई की तारीख बंगाल की सत्ता का रुख बदल सकती है।सवाल यही है कि  क्या “खेला” मैदान में होगा या संविधान की शर्तें सत्ता की बाजी पलट देंगी?