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Indira Gandhi Kal Patra: इंदिरा का टाइम कैप्सूल बना था सियासी विवाद , लाल किले में दफन हुआ इतिहास का राज, अंदर क्या था, पढ़िए रेड फोर्ट के नीचे गुमशुदा काल-पत्र की दास्तान

Indira Gandhi Kal Patra: लाल किले के नीचे दबा पहला काल-पत्र आज भी इतिहास की सबसे रहस्यमयी फाइलों में से एक है।क्या वह सच में भविष्य के लिए था?या फिर...

Indira Gandhi Kal Patra 1973 Time Capsule Still a Mystery
इंदिरा का टाइम कैप्सूल बना सियासी विवाद- फोटो : social Media

Indira Gandhi Kal Patra: 15 अगस्त 1973… दिल्ली की फ़िज़ा में आजादी की 26वीं सालगिरह का जश्न था। ऐ मेरे वतन के लोंगो के सुरमई गाने से लाल किले की प्राचीरें गूंज रही थीं, तिरंगा हवा में यूँ लहरा रहा था जैसे वक़्त खुद सलामी दे रहा हो। उस सुबह की हवा में एक अजीब-सी गंभीरता भी थी जश्न के भीतर कहीं इतिहास की तहों में छुपा हुआ एक राज पल रहा था।

तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भाषण दिया, देश को संबोधित किया और फिर एक ऐसी तरफ चल पड़ीं जहाँ इतिहास अक्सर चुप हो जाता है लाहौरी गेट की ओर।

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वहीं, पहले से 32 फीट गहरा एक कुआँ तैयार था। मिट्टी की परतों के नीचे जैसे समय को बंद करने की साज़िश रची जा रही हो। तांबे और स्टील से बना, वैक्यूम-सील्ड, भारी-भरकम एक कैप्सूल जिसे नाम दिया गया था: काल-पत्र। कहा गया इसे 1000 साल बाद खोला जाएगा। पर सवाल ये था क्या सच में यह भविष्य के लिए था… या वर्तमान को अपनी परछाई में कैद करने की कोशिश?

सत्ता, इतिहास और एक चुनी हुई कहानी तो 1970 का दशक… इंदिरा गांधी अपने राजनीतिक शिखर पर थीं। 1971 की जंग में पाकिस्तान पर जीत, सत्ता पर मज़बूत पकड़, और एक ऐसी छवि जो लोहे जैसी सख़्त मानी जाती थी। इसी दौर में जन्म हुआ उस विचार का कि आज़ादी के 25 साल बाद भारत की कहानी को एक दस्तावेज में बंद करके भविष्य को सौंप दिया जाए।

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जिम्मेदारी दी गई भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद को। काम सौंपा गया मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज के इतिहासकार प्रोफेसर एस. कृष्णस्वामी को। दस्तावेज बने, मसौदे तैयार हुए… मगर इतिहास हमेशा इतना सीधा कहाँ चलता है। प्रो. कृष्णस्वामी ने दस्तावेज़ तैयार तो कर दिए, लेकिन उन्हें भेजा गया एक और इतिहासकार के पास टी. बद्रीनाथ के पास।जैसे ही उन्होंने पन्ने पलटे, उनकी भौंहें तन गईं।क्या सच में अकाल खत्म हो गया है? क्या भूमि सुधारों ने कृषि क्रांति पूरी कर दी?ये सवाल सिर्फ सवाल नहीं थे… ये इतिहास पर उठी हुई उंगलियाँ थीं।बद्रीनाथ ने सार्वजनिक मंच से इसे चुनौती दी और यहीं से मामला आग पकड़ गया।आरोप लगने लगेये टाइम कैप्सूल नहीं, बल्कि सत्ता का आत्म-प्रशस्ति-पत्र है। 

सियासत का तूफ़ान और सफाई की कोशिश

विवाद बढ़ा। शोर दिल्ली से मद्रास तक फैल गया। विपक्ष ने इसे इतिहास की रंगाई-पुताई बताया। तब इंदिरा गांधी को सफाई देनी पड़ी। उन्होंने कहा कि मुझे इस प्रोजेक्ट की पूरी जानकारी नहीं है। लेकिन कहते हैं ना बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी...पर सवाल थमने वाले नहीं थे।इधर CPI(M) के नेताओं ने इसे सत्ता का प्रचार-पत्र करार दिया।कहा गया यह जनता का इतिहास नहीं, बल्कि सत्ता का सजाया हुआ आईना है।

इमरजेंसी की छाया और सत्ता परिवर्तन

1975 से 1977… देश पर इमरजेंसी का साया। लोकतंत्र की सांसें धीमी पड़ गईं। और जब 1977 में चुनाव हुए, तो जनता ने इतिहास पलट दिया।मोरारजी देसाई के नेतृत्व में नई सरकार बनी।और चुनावी मंचों पर एक वादा गूंजा-टाइम कैप्सूल खोला जाएगा… सच सामने लाया जाएगा।

खुदाई हुई तो जमीन ने राज उगल दिया। दिसंबर 1977… लाल किले की जमीन एक बार फिर खोदी गई। 58 हजार रुपये खर्च हुए, सुरक्षा कड़ी थी, माहौल में जिज्ञासा और बदले की राजनीति दोनों मौजूद थे। 8 दिसंबर को कैप्सूल बाहर आया। लोहे और तांबे का वह डिब्बा जैसे सदियों का बोझ ढोकर बाहर आया हो।कहा गया कि दस्तावेज संसद में रखे जाएंगे।पर फिर… एक अजीब सन्नाटा उतर आया।

क्या था अंदर? कौन-सी सच्चाई थी?यह सवाल इतिहास की फाइलों में कहीं दबकर रह गया।दस्तावेज संसद की लाइब्रेरी तक पहुंचे, चर्चाएँ भी हुईं… मगर जनता तक पूरा सच कभी नहीं आया। कुछ रिपोर्ट्स में दावा हुआ कि इसमें सिर्फ़ सरकारी उपलब्धियाँ, योजनाएँ और चुनिंदा घटनाएँ थीं और कई ऐतिहासिक नामों की अनुपस्थिति ने सवाल और गहरे कर दिए। लेखकों और पत्रकारों ने लिखा कि यह  सेलेक्टिव हिस्ट्री का उदाहरण था जहाँ यादें चुनी जाती हैं, और भूलने की रणनीति बनाई जाती है।

RTI, आयोग और अधूरी गूंज

2012 में पत्रकार मधु किश्वर ने सूचना का अधिकार (RTI) दाखिल किया।जवाब आया-“कोई जानकारी उपलब्ध नहीं।”फिर केंद्रीय सूचना आयोग ने निर्देश दिए… लेकिन दस्तावेज़ फिर भी धुंध में रहे।इतिहास जैसे खुद अपने ही वजन तले दब गया हो।

बहरहाल लाल किले के नीचे दबा वह पहला काल-पत्र आज भी इतिहास की सबसे रहस्यमयी फाइलों में से एक है।क्या वह सच में भविष्य के लिए था? या फिर वर्तमान को अपने मुताबिक लिखने की एक कोशिश? इतिहास शायद जवाब नहीं देता… वह सिर्फ़ सवाल छोड़ जाता है। और वो सवाल आज भी दिल्ली की उस जमीन के नीचे कहीं धड़कता है जहाँ 32 फीट गहराई में समय, सत्ता और सच… तीनों एक साथ दफ़्न हैं।

रिपोर्ट- हीरेश कुमार