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India Nuclear Program: ड्रैगन की चालबाजी के खिलाफ भारत की महा-घेरेबंदी, क्या ऑस्ट्रेलिया का यूरेनियम बनेगा भारत की तरक्क़ी का परमाणु बारूद? पढ़िए

India Nuclear Program: दुनिया के नक़्शे पर इस वक़्त एक बेहद पेचीदा और रणनीतिक शतरंज का खेल खेला जा रहा है. ...

India China Counter Will Aussie Uranium Fuel Nuclear Growth
ड्रैगन की चालबाजी के खिलाफ भारत की महा-घेरेबंदी,- फोटो : social Media

India Nuclear Program:  दुनिया के नक़्शे पर इस वक़्त एक बेहद पेचीदा और रणनीतिक शतरंज का खेल खेला जा रहा है. चीन ने जिस तरह पूरी दुनिया के बाज़ार पर अपनी मोनोपॉली क़ायम कर रखी है, उससे अब हर देश  ख़ौफ़जदा है. बीजिंग अपनी आर्थिक ताक़त के बूते पर दुनिया को ब्लैकमेल करने की दादगीरी पर उतर आया है—चाहे वह 'रेयर अर्थ एलिमेंट्स' की सप्लाई रोकना हो या कार कंपनियों को अपने इशारों पर नचाना. वॉशिंगटन में डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ की धौंस देकर ड्रैगन को डराने की पुरज़ोर कोशिश जरूर की, लेकिन अमेरिका भी अकेले बीजिंग का बाल बांका नहीं कर पाया. ऐसे में सवाल उठता है: क्या चीन की घेरेबंदी (Encirclement) शुरू हो चुकी है? और क्या भारत इस काउंटर-अटैक का मुख्य मोहरा बनने के लिए तैयार है?

दुनिया इस बात को बख़ूबी ताड़ चुकी है कि अगर चीन की चौधराहट को मटियामेट करना है, तो भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनना ही होगा. भारत के पास युवाओं की भारी-भरकम फ़ौजतो है, लेकिन इस बड़े मक़सद की राह का सबसे बड़ा रोड़ा है बिजली की कमी.सौर ऊर्जा  के लिए भी हमें सोलर पैनल और बैटरी स्टोरेज के वास्ते चीन की रहमो-करम पर निर्भर रहना पड़ता है.ऐसे में मुसलसल  और बिना रुकावट बिजली का सिर्फ एक ही मुकम्मल ज़रिया बचता है परमाणु ऊर्जा  और इसी पहेली का आख़िरी सिरा जुड़ता है प्रधानमंत्री के ऑस्ट्रेलिया दौरे और वहाँ से होने वाली यूरेनियम की ख़रीद से.

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परमाणु तकनीक का इतिहास बड़ा पेचीदा रहा है. साल 1968 में दुनिया के रसूख़दार देशों ने परमाणु अप्रसार संधि का एक ऐसा गैंग बनाया, जिसका मक़सद दूसरे देशों को परमाणु ताक़त बनने से रोकना था. अमेरिका और उसके सहयोगियों का तर्क था कि जिस ईंधन से बिजली बनेगी, उसी से परमाणु बम का धमाका भी हो सकता है जैसा आज ईरान और इजराइल के दरमियान मचे घमासान में दिख रहा है.

भारत ने इस भेदभावपूर्ण संधि पर दस्तख़त करने से साफ़ इंकार कर दिया. नई दिल्ली का स्टैंड साफ़ था कि होमी जहांगीर भाभा के दौर से हमारी परमाणु तकनीक सिर्फ अमन और तरक्क़ी के लिए है.1974 और 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद दुनिया ने भारत पर कड़े प्रतिबंधमढ़े, लेकिन 2008 की भारत-अमेरिका न्यूक्लियर डील ने इस घेराबंदी को नेस्तनाबूद कर दिया.

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हालांकि ऑस्ट्रेलिया के साथ नागरिक परमाणु समझौता 2014 में ही हो गया था, लेकिन NPT की तकनीकी अड़चनों की वजह से बात आगे नहीं बढ़ पा रही थी. मगर हालिया दिनों में जब चीन ने समंदर से लेकर ज़मीन तक अपनी आक्रामक विस्तारवादी नीति शुरू की, तो समीकरण पूरी तरह बदल गए.

QUAD (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) के वजूद में आने के बाद कैनबरा को यह यक़ीन हो गया है कि भारत ही चीन के अहंकार को चकनाचूर करने का माद्दा रखता है. ऑस्ट्रेलिया का यूरेनियम अब अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की निगरानी में भारत के कारख़ानों को रोशन करेगा. यह महज़ एक कारोबारी सौदा नहीं है, बल्कि चीन के आर्थिक साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ एक ऐसी रणनीतिक बिसात है, जिसमें अमेरिका की शह है, ऑस्ट्रेलिया का ईंधन है और भारत का पराक्रम है.