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राम के नाम पर राजनीति या राजनीति के नाम पर राम? दिल्ली के सियासी रंगमंच पर साधु, सत्ता और सियासत का प्रहसन,पढ़िए

राजनीति के इस रंगमंच पर अब साधु-संत, धार्मिक प्रतीक, आस्था और राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी एक-दूसरे में इस कदर घुल-मिल गए हैं कि यह तय करना कठिन हो जाता है कि कौन धर्म की चौखट पर खड़ा है और कौन सत्ता के दरबार में अपनी हाजिरी लगा रहा है।...

Delhi Politics Takes a Satirical Turn Over Saints Protest
राम के नाम पर राजनीति या राजनीति के नाम पर राम?- फोटो : social Media

Indian Politics: अद्यतन भारतीय राजनीति को समझने के लिए केवल चुनावी आंकड़ों, दलों की घोषणाओं और नेताओं के भाषणों को देखना पर्याप्त नहीं है। राजनीति के इस रंगमंच पर अब साधु-संत, धार्मिक प्रतीक, आस्था और राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी एक-दूसरे में इस कदर घुल-मिल गए हैं कि यह तय करना कठिन हो जाता है कि कौन धर्म की चौखट पर खड़ा है और कौन सत्ता के दरबार में अपनी हाजिरी लगा रहा है।

स्वामी राघवेन्द्र,संयोजक, सत्य धर्मसंवाद अपने लेख में लिखते हैं कि दिल्ली और मिर्ज़ा ग़ालिब का रिश्ता कुछ वैसा ही है, जैसे न्याय की पदार्थ-मीमांसा का उपादान कारण। आज दिल्ली में जो कुछ दिखाई दिया, वह ऐसा लगा मानो कोई अप्रशिक्षित विदूषक राजनीति का प्रहसन प्रस्तुत कर रहा हो और दर्शक यह तय न कर पा रहे हों कि ताली बजाएं या माथा पीटें।भारतीय मनीषा ने राजनीति के चरित्र और उसके अंतर्विरोधों को लेकर जो उद्घाटन सदियों पहले किए थे, वे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। राजनीति का चरित्र दोहरा है, तिहरा है अथवा चरित्रहीन  यह निर्णय पाठकों के विवेक पर छोड़ देना ही श्रेयस्कर होगा। क्योंकि आज की सियासत में विचारधारा अक्सर मौसम की तरह बदलती है और सिद्धांत सुविधा के अनुसार अपना लिबास बदल लेते हैं।इसी संदर्भ में मध्य प्रदेश सरकार में पूर्व मंत्री रहे कम्प्यूटर बाबा और कुछ अन्य धार्मिक चेहरों का दिल्ली में सामने आना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ये वही चेहरे हैं, जो विगत दिल्ली चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल के लिए चुनावी मंगलानुशासन करते दिखाई दिए थे। आज वही चेहरे पुनः चर्चा में हैं।विडंबना यह है कि अब इस मुल्क में खुले तौर पर साधु-संत विभिन्न राजनीतिक दलों को हिंदू धर्म का प्रमाणपत्र देने लगे हैं मानो किसी दल के हिंदू हितैषी होने की वैधता का अंतिम प्रमाणपत्र अब किसी राजनीतिक विचार या संविधान से नहीं, बल्कि किसी संत-महंत के आशीर्वचन से मिलेगा।

कम्प्यूटर बाबा के विषय में इंटरनेट पर पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। उन्हीं के नेतृत्व में लगभग सौ से अधिक साधुओं का एक समूह मंडी हाउस से प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर ज्ञापन सौंपने जा रहा था। प्रशासनिक अनुमति न होने के कारण उन्हें आगे जाने से रोक दिया गया। बाद में दिल्ली पुलिस कुछ महंतों को पीएमओ लेकर गई और, उनके अनुसार, उन्हें सामान्य कतार में खड़े होकर अपनी बात रखने को कहा गया।

यहीं से प्रहसन का दूसरा अंक शुरू होता है।सम्मानपूर्वक विज्ञप्ति नहीं ली गई यह शिकायत सामने आई। कहा गया कि यदि सत्तारूढ़ दल का कोई सांसद ही आ जाए तो संतों को संतोष हो जाएगा। इसे राम का अपमान बताया गया। कहा गया कि उनका जीवन राम के लिए है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कोई शिकायत नहीं है। साथ ही यह भी घोषणा हुई कि अब अटल समाधि पर एक-एक कर सभी साधु समाधि लेंगे।लेकिन प्रश्न यह है कि जिस क्षण कैमरों के सामने यह घोषणा हो रही थी, उस समय वे सौ से अधिक साधु कहाँ थे? दृश्य में तो कुछ ही चेहरे दिखाई दे रहे थे। शाम होते-होते वे प्रमुख चेहरे भी मानो ‘अदर्शनं लोपः’ की अवस्था को प्राप्त हो गए।

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राजनीतिक रंगमंच का यह दृश्य अपने आप में बहुत कुछ कहता है और फिर इस प्रहसन में निर्दलीय किंतु कांग्रेस समर्थित पूर्णिया सांसद पप्पू यादव की भी जोरदार एंट्री हुई। आगे बढ़ने पर रोक लगी तो वे कुछ साधुओं के साथ सड़क पर पीठ के बल लेट गए। इससे पहले भी संसद में उनके द्वारा साधु का स्वांग रचकर किए गए प्रहसन ने देशभर में तीखी प्रतिक्रिया पैदा की थी। उसके बाद ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने उनके इस स्वांग का शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर समर्थन किया और अब उसके बाद साधुओं का यह प्रदर्शन सामने आया।

सवाल यह नहीं है कि सड़क पर कौन लेटा और कौन खड़ा रहा। असली सवाल यह है कि राजनीति की यह पटकथा लिख कौन रहा है और इसका आखिरी मकसद क्या है?प्रदर्शन सतही और असंगठित था। इसमें वैचारिक रूप से ढुलमुल और सत्ता की पिपासा से प्रेरित साधु-वेशधारी चेहरे दिखाई दे रहे थे—ऐसा आरोप लगाया जा सकता है। कम्प्यूटर बाबा स्वयं भी राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले व्यक्ति के रूप में लंबे समय से विवादों में रहे हैं। कभी हिंदू राष्ट्र का समर्थन, कभी राम मंदिर के सवाल पर भाजपा को वोट न देने की अपील और कभी मुसलमानों को भारत से बाहर भेजने जैसे बयान इन तमाम प्रसंगों ने उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को लगातार बहस के केंद्र में रखा है।ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि धर्म और राजनीति का यह गठजोड़ आखिर किस दिशा में जा रहा है?

सबसे दिलचस्प दृश्य तब सामने आया, जब पप्पू यादव साधुओं के साथ ‘जय जय श्रीराम’ का उद्घोष करते दिखाई दिए। यह कांग्रेस की वैचारिकी के लिए एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। कांग्रेस आखिर किस विचारधारा के साथ खड़ी है? उन शक्तियों के साथ जो हिंदू राष्ट्र की वकालत करती हैं, या महात्मा गांधी की उस अवधारणा के साथ जिसमें धर्म व्यक्तिगत आस्था है और राजनीति का आधार सर्वधर्म-समभाव, नैतिकता तथा साधनों की पवित्रता होना चाहिए? गांधी का दर्शन स्पष्ट था साधन और साध्य को अलग नहीं किया जा सकता। साधन बीज है और साध्य उसी बीज से निकलने वाला वृक्ष। यदि बीज ही दूषित है तो वृक्ष के फल को पवित्र कैसे माना जा सकता है?यही प्रश्न कांग्रेस के सामने भी है।

यदि राम मंदिर से जुड़े कथित गबन या भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर कांग्रेस उन राजनीतिक शक्तियों का सहारा लेती है, जिनकी वैचारिकी उसके घोषित धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्म-समभाव के सिद्धांतों से मेल नहीं खाती, तो सत्ता हासिल कर लेने के बाद देश की राजनीति में वास्तविक परिवर्तन क्या होगा? क्या सत्ता ही राजनीति का अंतिम सत्य है? क्या कुर्सी के लिए हर गठजोड़ जायज़ है? क्या सत्ता प्राप्ति के लिए विचारधारा को ताक पर रख देना लोकतांत्रिक नैतिकता का हिस्सा माना जा सकता है?और यदि ऐसा है तो फिर वैज्ञानिक चेतना, संविधानवाद और सर्वधर्म-समभाव की बातें केवल चुनावी शब्दावली बनकर रह जाएंगी।

भारतीय राजनीति की इसी विडंबना पर भर्तृहरि का वह प्रसिद्ध भाव आज की दिल्ली में साक्षात चरितार्थ होता प्रतीत होता है कहीं सत्य, कहीं मिथ्या; कहीं कटु वचन, कहीं प्रियभाषण; कहीं हिंसा, कहीं दया; कहीं लोभ, कहीं दान। राजनीति भी मानो वेश्या की भाँति अवसर के अनुसार अनेक रूप धारण कर लेती है।यही कारण है कि भारतीय राजनीति में गुणात्मक सुधार की बात करना तब तक बेमानी है, जब तक राजनीतिक दल अपने सिद्धांतों और व्यवहार के बीच की खाई को पाटने का साहस नहीं करते।आप पूछ सकते हैं कि इस पूरे प्रदर्शन में कांग्रेस कहाँ थी?तो उत्तर वही है वह वैसे ही थी जैसे सरसों में तेल और सांख्य दर्शन के सत्कार्यवाद में कार्य अपने कारण में पहले से विद्यमान रहता है।दिल्ली के इस सियासी तमाशे को यदि आज मिर्ज़ा ग़ालिब देख रहे होते तो शायद उनकी जुबान से यही निकलता-“बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे, होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे।”

वास्तव में आज की राजनीति भी किसी बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल से कम नहीं। यहां धर्म है, लेकिन धर्म के भीतर राजनीति है; यहां साधु हैं, मगर साधुओं के बीच सत्ता की आकांक्षा है; यहां राम हैं, मगर राम के नाम पर सियासी समीकरण हैं; यहां विचारधारा है, मगर उसके ऊपर चुनावी गणित का मुलम्मा चढ़ा हुआ है।

स्वामी राघवेंद्र ने राजनीति के इस पूरे घटनाक्रम को जिस व्यंग्यात्मक और दार्शनिक दृष्टि से देखा है, उससे सहमत या असहमत होना पाठकों का अधिकार है। लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि असहमति के बावजूद विचार किया जाए।क्योंकि सवाल केवल इतना नहीं कि आज दिल्ली में कौन प्रदर्शन कर रहा था।बड़ा सवाल यह है कि भारतीय राजनीति में धर्म, सत्ता और विचारधारा के बीच की लक्ष्मणरेखा आखिर कहाँ बची है?

(लेख में संपादकीय परिवर्तन के साथ साभार:  स्वामी राघवेन्द्र,संयोजक, सत्य धर्मसंवाद)