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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सरकारी कर्मचारियों पर SC/ST एक्ट में केस दर्ज करने से पहले प्रशासनिक जांच अनिवार्य

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को बड़ी राहत देते SC/ST एक्ट को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि किसी भी लोक सेवक के खिलाफ इस अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज करने से पहले अनिवार्य रूप से प्रशासनिक जांच करानी होगी

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सरकारी कर्मचारियों पर SC/ST एक्ट में
उत्तराखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला- फोटो : सोशल मीडिया

Uttrakhand : उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST एक्ट) को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश के अनुसार, अब राज्य में किसी भी लोक सेवक (सरकारी अधिकारी या कर्मचारी) के खिलाफ इस कड़े कानून के तहत मुकदमा दर्ज करने से पहले एक विस्तृत प्रशासनिक जांच कराना अनिवार्य होगा। जस्टिस आलोक मेहरा की एकल पीठ (सिंगल जज बेंच) ने बुधवार को यह अहम निर्णय सुनाते हुए निचली अदालत (सेशंस कोर्ट) के उस आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया, जिसमें बिना किसी जांच रिपोर्ट के दो पुलिस अधिकारियों पर केस दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।


सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का दिया हवाला

यह पूरा मामला हल्द्वानी के मुखानी थाना क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में तय किए गए कानूनी सिद्धांतों और गाइडलाइंस को एक बार फिर दोहराया। न्यायालय ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि इस मामले में सेशंस कोर्ट ने स्थापित कानूनी नियमों और तय प्रक्रियाओं का स्पष्ट उल्लंघन किया है। हाईकोर्ट ने साफ किया कि जब तक किसी निष्पक्ष प्रशासनिक जांच में लोक सेवक के खिलाफ आरोपों की पुष्टि या इसकी सिफारिश (संस्तुति) नहीं की जाती, तब तक उनके विरुद्ध SC/ST एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती।


दो साल पुराना है मामला, महिला ने लगाया था दुर्व्यवहार का आरोप

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दरअसल इस विवाद की शुरुआत करीब दो साल पहले वर्ष 2024 में हुई थी, जब नैनीताल की जिला एवं सत्र अदालत (डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस कोर्ट) ने एक महिला की अर्जी पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया था। महिला ने सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत अदालत में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि उसके साथ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर दुर्व्यवहार और मारपीट की गई है। शुरुआत में जब पुलिस ने मामले की आंतरिक जांच की, तो महिला के आरोप झूठे पाए गए और पुलिस ने मुकदमा दर्ज नहीं किया। इसके बाद महिला ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।


लापरवाही के आरोप में पुलिस अफसरों पर भी केस का था निर्देश

महिला की अर्जी पर संज्ञान लेते हुए सेशंस कोर्ट ने न सिर्फ मुख्य आरोपी युवक के खिलाफ आईपीसी और SC/ST एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया, बल्कि कर्तव्य का पालन न करने के आरोप में दो पुलिस अधिकारियों पर भी गाज गिरा दी। कोर्ट ने तत्कालीन पुलिस क्षेत्राधिकारी (सीओ) भूपेंद्र धोनी और सब-इंस्पेक्टर (एसआई) रमेश बोहरा के खिलाफ भी कर्तव्य में लापरवाही बरतने के आरोप में SC/ST एक्ट की धारा 4 के तहत मुकदमा चलाने का निर्देश जारी कर दिया था। इस आदेश के बाद पुलिस महकमे में खलबली मच गई थी।


धारा 4(2) के तहत प्रशासनिक जांच है पहली शर्त

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निचली अदालत के इस फैसले के खिलाफ तत्कालीन सीओ भूपेंद्र धोनी और एसआई रमेश बोहरा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी थी। पुलिस अधिकारियों की ओर से अदालत में दलील दी गई कि सेशंस जज ने SC/ST एक्ट की धारा 4(2) के तहत अनिवार्य रूप से दी गई पूर्व-शर्तों की अनदेखी की है। कानून के अनुसार, किसी भी सरकारी कर्मचारी पर अपनी ड्यूटी में लापरवाही बरतने के लिए आपराधिक मुकदमा शुरू करने से पहले एक स्वतंत्र प्रशासनिक जांच आवश्यक है, जो कि इस मामले में बिल्कुल नहीं की गई थी। हाईकोर्ट ने इन तर्कों को सही ठहराते हुए अधिकारियों के पक्ष में फैसला सुनाया।