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पिता की अर्थी के बीच नन्हे बच्चे ने ली पहली सांस, मौत के मातम में गूंजी ज़िंदगी की पुकार, घटना दिल की दीवारें चीर देगी

Father Death and Child Birth:वह मनहूस सुबह थी जब एक घर में मातम पसरा था, रोने-बिलखने की आवाज़ें उठ रही थीं, और उसी वक्त किस्मत ने ऐसा क्रूर खेल खेला कि खुशी और ग़म एक ही छत के नीचे आमने-सामने खड़े हो गए।

Unnao Amid Father s Funeral Newborn Takes First Breath
पिता की अर्थी के बीच नन्हे बच्चे ने ली पहली सांस- फोटो : social Media

Father Death and Child Birth:यह दास्तान ऐसी है कि जिसे सुनकर रूह काँप जाए और कलेजा मुँह को आ जाए। यह वह मनहूस सुबह थी जब एक घर में मातम पसरा था, रोने-बिलखने की आवाज़ें उठ रही थीं, और उसी वक्त किस्मत ने ऐसा क्रूर खेल खेला कि खुशी और ग़म एक ही छत के नीचे आमने-सामने खड़े हो गए। पड़रीकला गांव में एक अभागे मासूम ने तब दुनिया में पहली सांस ली, जब उसकी आँखें खुलने से कुछ ही कदम दूर उसके पिता की अर्थी दरवाज़े पर रखी थी। चारों तरफ अश्रुपूर्ण निगाहें थीं, गमगीन चेहरे थे और हवा में मातम का सन्नाटा तैर रहा था। जिसे भी इस घटना का इल्म हुआ, उसकी आंखें नम हुए बगैर न रहीं।उन्नाव की सरज़मीं पर घटना घटी।

मनोज और उसकी पत्नी संगीता की ज़िंदगी पहले बिल्कुल आम थी। उनके तीन बच्चे करन, अर्जुन और मुस्कान घर की रौनक थे। संगीता नौ माह की गर्भवती थी और हर कोई नई किलकारी का इंतज़ार कर रहा था। लेकिन ज़िंदगी की राहें हमेशा आसान नहीं होतीं। गुरुवार की सुबह मनोज ने न जाने किस दर्द, किस मजबूरी या किस अंधेरे में जाकर अपने ही घर के पास फांसी का फंदा लगा लिया और इस दुनिया को अलविदा कह दिया। जब उसका निर्जीव शरीर मिला, तो गांव में सन्नाटा छा गया। कोई समझ नहीं पाया कि खुशमिज़ाज दिखने वाले मनोज के दिल में कौन-सी आग लगी थी, जो उसे ऐसी खामोश मौत की तरफ धकेल गई।

पोस्टमार्टम के बाद जब मनोज का शव गांव लाया गया, तब घर में कोहराम मच गया। बुजुर्ग अंतिम संस्कार की तैयारी में लगे थे, और घर की औरतें फूट-फूटकर रो रही थीं। ऐसे में अचानक भीतर से एक नवजात की रोने की आवाज़ गूंजी एक ऐसी आवाज़ जिसने पूरे माहौल को पलभर के लिए थाम दिया। यह वही किलकारी थी जिसका इंतज़ार महीनों से था, मगर नियति ने इसे ऐसे मौके पर भेजा जब घर पर मातम का साया था। संगीता ने उसी वक़्त एक बेटे को जन्म दिया, मगर उसकी आंखों में खुशी की चमक नहीं, सिर्फ़ गहरे दर्द और उलझन की धुंध थी। यह कैसी घड़ी थी कि मां समझ न पा रही थी कि वह खुश हो या शोक मनाए।

उधर मनोज की अर्थी उठाने की तैयारी थी, और इधर उसी घर में एक नई ज़िंदगी ने दस्तक दी। किस्मत का यह तंज इतना करारा था कि पूरे गांव का दिल भर आया। हर नज़र गमगीन थी, हर आंख नम। संगीता के मन में अब एक ही चिंता घर किए बैठी है तीन बच्चों की परवरिश का बोझ पहले ही भारी था, अब चौथे मासूम की ज़िम्मेदारी कैसे उठाएगी? कौन बनेगा उस नवजात के सिर पर पिता का साया?

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यह घटना सिर्फ़ एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि ज़िंदगी के क्रूर सच का आईना है जहाँ खुशी और गम अक्सर एक-दूसरे के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े नज़र आते हैं।