Bihar Teacher Pension Issue: कलम जिसने रोशनी दी, आज वही शिक्षक अंधेरे में, पेंशन के इंतजार में टूटती साँसें, बिखरता सम्मान, सुन रहे हैं सरकार....

सरकारी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में हजारों अवकाश प्राप्त शिक्षक और कर्मचारी महीनों से पेंशन के इंतजार में हैं।हालत ये जून का मध्य बीतने पर भी वे प्रतीक्षा कर रहे हैं....

Bihar Pension Crisis Deepens Retired college Teachers Face H
शिक्षकों की पेंशन के इंतजार में टूटती साँसें- फोटो : Hiresh Kumar

Bihar Teacher Pension Issue: बिहार के शिक्षा जगत में इन दिनों दर्द की एक ऐसी खामोश चीख गूंज रही है, जिसे न तो सिस्टम सुन पा रहा है और न ही सत्ता के गलियारों तक उसकी कराह पहुंच पा रही है। यह कहानी उन बुज़ुर्ग शिक्षकों की है, जिन्होंने अपनी पूरी उम्र ज्ञान का दीप जलाने में लगा दी, लेकिन आज वही दीपक उनके अपने घर में अंधेरे का कारण बन गया है। सरकारी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में हजारों अवकाश प्राप्त शिक्षक और कर्मचारी महीनों से पेंशन के इंतजार में हैं। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि कई बुज़ुर्ग शिक्षक दवा और रोटी के बीच झूलते हुए जीवन की जंग लड़ रहे हैं।

सीवान जिले में अवकाश प्राप्त कॉलेज शिक्षकों की एक भावुक और गंभीर बैठक आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता डॉ. रामानंद पाण्डेय ने प्रोफेसर सीडी चौधरी के आवास पर की। इस बैठक में जो पीड़ा छलकी, वह किसी प्रशासनिक फाइल में दर्ज नहीं हो सकती। वहां बैठे हर चेहरे पर वर्षों की सेवा का गौरव था, लेकिन आंखों में आज की उपेक्षा का दर्द साफ झलक रहा था। पेंशन की अनियमितता को लेकर शिक्षकों में गहरा आक्रोश और निराशा दोनों दिखाई दिए।

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बैठक में प्रोफेसर ओबेदुल्लाह की आवाज़ भर्रा गई जब उन्होंने कहा कि “पैसे के अभाव में कई वरिष्ठ शिक्षक उचित इलाज से वंचित हैं, दवा तक नसीब नहीं हो रही।” यह शब्द केवल शिकायत नहीं थे, बल्कि एक ऐसे जीवन की सच्चाई थे जो धीरे-धीरे टूट रहा है। वहीं डॉ. सीडी चौधरी ने कहा कि 65 वर्ष से अधिक उम्र के ये शिक्षक हर दिन चिकित्सकीय सहायता पर निर्भर हैं, लेकिन सरकार और कॉलेज प्रशासन की उदासीनता ने उन्हें असहाय छोड़ दिया है।डॉ. सुरेंद्र नाथ पाण्डेय की बात और भी दिल को चीर देने वाली थी। उन्होंने कहा “पेंशन बुढ़ापे का सहारा होती है, लेकिन अगर वही समय पर न मिले तो इंसान जीते-जी टूट जाता है।” उनकी आवाज़ में सिर्फ नाराज़गी नहीं, बल्कि एक गहरी वेदना थी, जैसे वर्षों की मेहनत आज उपेक्षा की धूल में दब गई हो। डॉ. रविंद्र पाठक ने राज्यपाल और बिहार सरकार से सीधा हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा कि जिस प्रकार अन्य सरकारी पदाधिकारियों को समय पर पेंशन मिलती है, उसी तरह कॉलेज शिक्षकों को भी उनका हक बिना देरी मिलना चाहिए। यह कोई मांग नहीं, बल्कि वर्षों की सेवा का अधिकार है।

बैठक में उपस्थित सभी शिक्षकों ने एक स्वर में अपनी पीड़ा व्यक्त की यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं, बल्कि सम्मान और अस्तित्व का संकट है। उन्होंने सरकार से भावुक अपील की कि जल्द से जल्द पेंशन भुगतान सुनिश्चित किया जाए, क्योंकि हर बीतता दिन उनके लिए संघर्ष को और कठिन बना रहा है। यह पूरा मामला केवल एक प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जिसने ज्ञान देने वालों को उनके जीवन के सबसे कमजोर दौर में अकेला छोड़ दिया है। आज ये शिक्षक सिर्फ पेंशन नहीं मांग रहे, वे अपने जीवन की आखिरी गरिमा की गुहार लगा रहे हैं।

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हीरेश कुमार की रिपोर्ट