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Chaurchan Festival: मिथिला में आज सजेगा आस्था का चांद, चौरचन की परंपरा में छिपी है अकबर-हेमांगद ठाकुर की दिलचस्प दास्तान

Chaurchan Festival: मिथिलांचल में लोक आस्था और परंपरा का महापर्व चौरचन आज, 14 सितंबर को भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा।...

Chaurachan Mithila Moon Festival
मिथिला का मिनी छठ चौरचन पर्व आज- फोटो : reporter

Chaurchan Festival: मिथिलांचल में लोक आस्था और परंपरा का महापर्व चौरचन आज, 14 सितंबर को भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। मिथिला का यह पर्व अपने धार्मिक महत्व के कारण ‘मिनी छठ’ के नाम से भी मशहूर है। चौरचन में विशेष तौर पर चंद्रमा की पूजा की जाती है। महिलाएं और श्रद्धालु हाथों में दही, फल, पकवान समेत विभिन्न पूजन सामग्री लेकर चंद्रमा का दर्शन करते हैं और विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं।

चौरचन पर्व की शुरुआत और इसके महत्व के पीछे दो बेहद रोचक पौराणिक कथा है जिसका जुड़ाव मिथिलांचल से भी है दरभंगा महाराज से जुड़े इस कहानी को लेकर  कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलानुशासक सह ज्योतिषीचार्य डॉ. कुणाल कुमार झा ने बताया कि भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को यानी आज मनाई जा रही  है. चतुर्थी तिथि चंद्र व्यापिनी होती है, जिसका अर्थ है कि संध्या समय चंद्रोदय होना जरूरी है. इसलिए यह व्रत आज यानी 14 सितंबर को ही मनाया जा रहा है. इसे चौठ चंद्र पूजन भी कहा जाता है और इसमें रोहिणी सहित चतुर्थी चंद्र के पूजन का विशेष महत्व है.

यह पर्व लगभग पांच सौ साल पहले मिथिला नरेश महेश ठाकुर के संतान हेमांगद ठाकुर जो की ज्योतिष और ग्रह-नक्षत्रों के विद्वान थे। उन्हें किसी वार्तालाप के क्रम में अकबर ने उन्हें हिरासत में लेकर दिल्ली के जेल में डाल दिया था . उसी क्रम में वह गणना करते थे कि कब सूर्य ग्रहण लगेगा कब चंद्र ग्रहण लगेगा इसकी गणना करते रहते थे जो ग्रहण माला पुस्तक के नाम से विख्यात है जिसको स्व पंडित ब्रजकिशोर झा जी ने संपादित किया है अभी भी जो सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण लगता है उसकी गणना भी उसी से किया जाता है जिसे सटीक माना जाता है 

इसी तरह हेमांगद ठाकुर उस समय जेल की दिवार पर गणना कर रहे थे इसकी जानकारी किसी ने अकबर को दे दी अकबर ने पूछा जो हमारी दूतिया का चांद कब दिखेगा वह बताओं जिसके बाद डर से हेमांगद ठाकुर ने एक दिन पहले की बात बता दी जो दूतिया का चांद आमुख दिन ही निकलेगा और पहले से ही उन लोगों को पता था जो एक दिन बाद निकलेगा और उस रोज मुस्लिम लोगों का ईद का पर्व मनाया जाता है

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इस बात का आभास होते हुये भी की एक दिन बाद निकलेगा चांद फिर गणना किया तो उनको लगा जो नहीं वह लोग सही है लेकिन आध्यात्मिक शक्ति इतनी बड़ी है चंद्रमा का आराधना करके उन्होंने मन्नत मांगी की एक दिन पूर्व यदि आकाश में चांद दृश्यवान होंगे तो पूरे मिथिलांचल में आपका पूजन करेंगे. उनके बंदी बनाए जाने और बाद में अपनी विद्वता के आधार पर सम्मान के साथ मिथिला लौटने का दिन भाद्र शुक्ल चतुर्थी था और इसी अवसर पर चंद्रमा की पूजा की गई, जिसके बाद यह परंपरा लोकप्रिय हुई। ज्योतिषीचार्य  डॉ. कुणाल कुमार झा के मुताबिक यह पर पर्व सिर्फ मिथिलांचल में ही मनाया जाता है लेकिन जो  के लोग दिल्ली मुंबई अमेरिका या फिर दूसरे प्रदेश और दूसरे देश में रहते हैं वहां ही मान लेते हैं कुछ लोग तो ट्रेन में ही सफर करते रहते तो वहां ही मान लेते है.

वहीं इस पर्व की एक पौराणिक मान्यता है कि एक बार भगवान गणेश मूषक पर सवार होकर जा रहे थे। उनका भारी शरीर देखकर चंद्रमा को हंसी आ गई और उन्होंने गणेश जी के रूप का उपहास उड़ाया। अपने रूप का उपहास उड़ते देख गणेश जी क्रोधित हो गए और उन्होंने चंद्रमा को श्राप दे दिया कि जो भी व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन तुम्हें (चांद को) देखेगा, उस पर झूठा कलंक (अपयश) लगेगा।श्राप मिलने के बाद चंद्रमा की आभा फीकी पड़ गई और वे छिप गए। अपनी भूल का अहसास होने पर चंद्रमा ने भगवान गणेश से क्षमा मांगी। देवताओं के आग्रह और चंद्रमा के पश्चाताप को देखकर गणेश जी का गुस्सा शांत हुआ। उन्होंने श्राप को पूरी तरह वापस लेने में असमर्थता जताई, लेकिन उसमें एक रियायत दी। गणेश जी ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति इस दिन दिनभर व्रत रखकर, शाम के समय पूरे विधि-विधान से चंद्रमा की पूजा करेगा और हाथ में फल या प्रसाद लेकर उन्हें देखेगा, तो वह कलंक से मुक्त हो जाएगा। साथ ही, उसे मानसिक शांति और समृद्धि मिलेगी।मिथिला में इसी कथा को आधार मानकर कलंक से बचने और जीवन में शुभता लाने के लिए चौरचन का व्रत शुरू हुआ।

वहीं मिला झा जो हर वर्ष इस पर्व को करते है उन्होंने जानकारी दी की इस पर्व का मान्यता यह है कि उसे रोज चंद्रमा में दोष रहता है इसलिए चंद्रमा को ऊपर खाली हाथ नहीं देखा जाता है फल दही या फिर हाथ में केल लेकर देखा जाता है यही पूर्वज से चला आ रहा है इसका विधि विधान यह है कि नये मिट्टी के बर्तन में दही जमाया जाता है उसके बाद नया डलिया में फल फूल पकवान जैसे पिरिकिया,  ठेकुआ, खजूर, और पूड़ी सब फिर खुले अंगने में अरिपन बनाते है फिर उसी अरिपन में एक तरफ डाली और दूसरी तरफ दही का बर्तन  देकर सजाया जाता है फिर उसके बीच में केला के पात पर मर्रर दिया जाता है  जिसमें खीर के ऊपर से पूरी मिठाई केला आदि पकवान रहते हैं जो पूजा के बाद पुरुष के द्वारा हाथ से चीरा जाता है और इसकी यह भी मान्यता है जो उसी जगह खाया जाता है वहाँ बैठकर सिर्फ पुरुष ही खाते है जो बचता है उसको जल में प्रवाहित कर दिया जाता है .

चौरचन को 'मिनी छठ' इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी पूरी विधि और नियम छठ महापर्व से काफी मिलते-जुलते हैं:मिट्टी के चूल्हे पर प्रसाद बनना जैसे छठ पर्व में बनाया जाता है  वैसे जहाँ छठ में डूबते और उगते सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है, वहीं चौरचन में ढलते सूरज और उगते हुए चौथी के चांद को अर्घ्य दिया जाता है। जो व्रती दिनभर भूखे रहकर शाम को पूजा के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करते हैं

रिपोर्ट- वरुण ठाकुर