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बिहार में जहां आस्था मिलती है इतिहास से... अंगभूमि का दिव्य तीर्थ बाबा ज्येष्ठगौरनाथ धाम, 1400 वर्ष पुरानी दुर्लभ ज्येष्ठ शिवलिंग , कर लीजिए दर्शन

Bihar Baba Jyeshthagaurnath Dham: अंग प्रदेश की पुण्यभूमि में स्थित बाबा ज्येष्ठगौरनाथ महादेव धाम केवल एक प्राचीन शिव मंदिर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा, इतिहास, पुरातत्व और पौराणिक आस्था का अद्वितीय संगम है।...

Baba Jyeshthagaurnath Dham Houses Rare Ancient Ekmukhi Shivl
1400 वर्ष पुरानी दुर्लभ ज्येष्ठ शिवलिंग- फोटो : reporter

Banka: अंग प्रदेश की पुण्यभूमि में स्थित बाबा ज्येष्ठगौरनाथ महादेव धाम केवल एक प्राचीन शिव मंदिर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा, इतिहास, पुरातत्व और पौराणिक आस्था का अद्वितीय संगम है। बांका जिले के अमरपुर एवं रजौन प्रखंड की सीमा पर चांदन नदी के दक्षिण-पश्चिमी तट तथा प्राकृतिक सौंदर्य से आच्छादित जेठौर पर्वत की तलहटी में अवस्थित यह प्राचीन धाम शताब्दियों से शिवभक्तों की श्रद्धा का सर्वोच्च केंद्र बना हुआ है। श्रावण मास, महाशिवरात्रि और प्रत्येक सोमवार को यहां हजारों श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ के जलाभिषेक एवं रुद्राभिषेक के लिए पहुंचते हैं। जनश्रुति है कि बाबा ज्येष्ठगौरनाथ के श्रीचरणों में सच्ची श्रद्धा और निर्मल भाव से प्रस्तुत की गई प्रत्येक प्रार्थना अवश्य स्वीकार होती है।

दुर्लभ 'ज्येष्ठ' शिवलिंग, जिसकी देशभर में है विशिष्ट पहचान

इस प्राचीन मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थापित एकमुखी 'ज्येष्ठ' शिवलिंग है। यह शिवलिंग अपनी अद्वितीय संरचना, प्राचीनता तथा शिल्पवैभव के कारण इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और धर्माचार्यों के लिए विशेष अध्ययन का विषय रहा है।मुख्य मंदिर के उत्तर दिशा में स्थित लक्ष्मीनारायण मंदिर परिसर में स्थापित यह शिवलिंग सामान्य शिवलिंगों से पूर्णतः भिन्न है। इसके रुद्रभाग पर भगवान शिव का दिव्य मुख स्पष्ट रूप से उत्कीर्ण है, जिसमें जटाजूट, कर्णकुंडल तथा गले का हार अत्यंत सूक्ष्मता से अंकित दिखाई देता है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि सामान्य शिव प्रतिमाओं की भांति इसमें त्रिनेत्र अंकित नहीं है। यही विशेषता इसे भारत के अत्यंत दुर्लभ शिवलिंगों की श्रेणी में प्रतिष्ठित करती है।

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विशेषज्ञों के अनुसार यह शिवलिंग तत्कालीन भारतीय शिल्प एवं स्थापत्य कला का अनुपम उदाहरण है तथा इसकी प्राचीनता लगभग चौदह सौ वर्ष मानी जाती है।

सम्राट शशांक गौर ने कराया था स्थापना

स्थानीय इतिहासकारों एवं प्राचीन अभिलेखों के अनुसार लगभग 1400 वर्ष पूर्व सम्राट हर्षवर्धन के समकालीन गौड़ शासक शशांक गौर ने अपने विशाल साम्राज्य में भगवान शिव के 108 विशिष्ट स्वरूपों की स्थापना कराई थी।उन्हीं शिवलिंगों में बाबा ज्येष्ठगौरनाथ का शिवलिंग सबसे विशाल एवं सर्वोच्च महत्व वाला माना गया, जिसके कारण इसे 'ज्येष्ठ', अर्थात सबसे श्रेष्ठ एवं वरिष्ठ स्वरूप का नाम प्राप्त हुआ।इतिहासकारों का कहना है कि भागलपुर जिले के शाहकुंड क्षेत्र में भी इसी शैली का शिवलिंग प्राप्त हुआ है। प्राचीन ग्रंथ 'अंग दशाष्टक' में भी शशांक गौर द्वारा स्थापित 108 शिवलिंगों का उल्लेख मिलता है, जिससे इस धाम का ऐतिहासिक महत्व और अधिक सुदृढ़ हो जाता है।

दानवीर कर्ण की चिताभूमि से जुड़ी अमिट आस्था

बाबा ज्येष्ठगौरनाथ धाम का महत्व केवल शिवभक्ति तक सीमित नहीं है। मंदिर परिसर के पूर्व में प्रवाहित चांदन नदी के मध्य स्थित स्थल को महाभारत कालीन दानवीर कर्ण की चिताभूमि माना जाता है।मंदिर के पुजारी पंडित राजा झा एवं रमण पाठक के अनुसार महाभारत युद्ध में वीरगति प्राप्त करने के पश्चात कर्ण ने भगवान श्रीकृष्ण से ऐसी भूमि पर अंतिम संस्कार करने का अनुरोध किया था, जहां पूर्व में किसी का दाह संस्कार न हुआ हो।मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कर्ण के पार्थिव शरीर को इस स्थान पर लाए और अपने करकमलों से उनका अंतिम संस्कार किया।स्थानीय श्रद्धालुओं का दावा है कि चांदन नदी में चाहे कितनी भी भीषण बाढ़ क्यों न आए, यह चितास्थल कभी जलमग्न नहीं होता। वर्ष 1995 की प्रलयंकारी बाढ़ के दौरान भी इस स्थान का सुरक्षित रहना श्रद्धालुओं के लिए आज भी आस्था का विषय बना हुआ है।

मां दक्षिणेश्वर काली मंदिर बढ़ाता है आध्यात्मिक वैभव

जेठौर पर्वत की पश्चिमोत्तर दिशा में स्थित मां दक्षिणेश्वर काली मंदिर भी इस क्षेत्र की धार्मिक गरिमा को और अधिक समृद्ध बनाता है।बाबा ज्येष्ठगौरनाथ के दर्शन के उपरांत श्रद्धालु कर्ण की पावन चिताभूमि तथा मां दक्षिणेश्वर काली के मंदिर में भी विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करते हैं।एक ही क्षेत्र में भगवान शिव, दानवीर कर्ण की पौराणिक चिताभूमि तथा मां काली का सिद्धपीठ स्थित होना इस संपूर्ण परिसर को बिहार के महत्वपूर्ण आध्यात्मिक तीर्थों में विशिष्ट स्थान प्रदान करता है।

श्रावण मास और महाशिवरात्रि में उमड़ता है श्रद्धा का महासागर

श्रावण मास के दौरान उत्तरवाहिनी गंगा से पवित्र गंगाजल लेकर हजारों कांवरिये पैदल यात्रा करते हुए बाबा ज्येष्ठगौरनाथ धाम पहुंचते हैं और जलाभिषेक कर अपने जीवन को धन्य मानते हैं।महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां तीन दिवसीय भव्य धार्मिक मेले का आयोजन होता है। शिव बारात, वैदिक अनुष्ठान, रुद्राभिषेक, भजन-संध्या, सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा विशाल भंडारा इस मेले के प्रमुख आकर्षण होते हैं। दूर-दराज के राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस पावन अवसर पर यहां पहुंचते हैं।

राजकीय धार्मिक एवं पर्यटन स्थल घोषित करने की वर्षों पुरानी मांग

स्थानीय सामाजिक संगठनों, इतिहासकारों एवं जनप्रतिनिधियों की लंबे समय से मांग रही है कि बाबा ज्येष्ठगौरनाथ महादेव धाम को राजकीय धार्मिक एवं पर्यटन स्थल घोषित किया जाए।उनका मानना है कि यह धाम केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पुरातात्विक दृष्टि से भी राष्ट्रीय महत्व की धरोहर है।

स्थानीय विधायक जयंत राज कुशवाहा भी कई अवसरों पर बिहार विधानसभा में इस विषय को प्रमुखता से उठा चुके हैं। उन्होंने मंदिर परिसर के समग्र विकास, बेहतर सड़क संपर्क, प्रकाश व्यवस्था, पार्किंग, श्रद्धालुओं के विश्राम गृह, पर्यटन सूचना केंद्र तथा अन्य आधारभूत सुविधाओं के विस्तार की मांग सरकार के समक्ष रखी है।जनप्रतिनिधियों का विश्वास है कि यदि इस धाम का योजनाबद्ध विकास किया जाए तो यह स्थल बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश के प्रमुख आध्यात्मिक पर्यटन केंद्रों में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर सकता है।

मंदिर तक पहुंचना है अत्यंत सुगम

बाबा ज्येष्ठगौरनाथ धाम सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। बांका-अमरपुर मुख्य मार्ग स्थित इंग्लिश मोड़ से लगभग पांच किलोमीटर पूर्व तथा भागलपुर-हंसडीहा मुख्य मार्ग पर पुनसिया बाजार से लगभग दस किलोमीटर पश्चिम यह प्राचीन मंदिर स्थित है।इंग्लिश मोड़ और पुनसिया बाजार से दिनभर ऑटो, टेंपो एवं अन्य सार्वजनिक वाहन उपलब्ध रहते हैं, जिससे श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा का सामना नहीं करना पड़ता।

आस्था और विरासत का अमूल्य धरोहर

बाबा ज्येष्ठगौरनाथ महादेव धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक चेतना, ऐतिहासिक विरासत और सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक है। दुर्लभ ज्येष्ठ शिवलिंग, सम्राट शशांक गौर का ऐतिहासिक योगदान, दानवीर कर्ण की चिताभूमि, मां दक्षिणेश्वर काली का सिद्धपीठ तथा प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण जेठौर पर्वत इस धाम को अद्वितीय बनाते हैं। यदि इस ऐतिहासिक धरोहर को समुचित संरक्षण, राजकीय मान्यता और आधुनिक पर्यटन सुविधाएं प्राप्त होती हैं, तो निश्चय ही बाबा ज्येष्ठगौरनाथ धाम भविष्य में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र के रूप में स्थापित होकर बिहार की सांस्कृतिक गरिमा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएगा।

रिपोर्ट- चंद्रशेखर भगत