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जातिगत जनगणना 2027 पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, याचिकाकर्ता को दिया बड़ा झटका

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने दलील दी कि सरकार के पास पहले से ही जातिगत आंकड़े और पर्याप्त जानकारी उपलब्ध है, इसलिए अलग से जाति आधारित जनगणना की आवश्यकता नहीं है।

Caste census
Caste census- फोटो : news4nation

Caste census: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार के जाति आधारित जनगणना कराने के फैसले को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी। अदालत ने साफ कहा कि यह पूरी तरह से नीतिगत मामला है और इसमें न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और विपुल पंचोली की पीठ ने की। याचिका सुधाकर गुम्मुला की ओर से दायर की गई थी।


सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने दलील दी कि सरकार के पास पहले से ही जातिगत आंकड़े और पर्याप्त जानकारी उपलब्ध है, इसलिए अलग से जाति आधारित जनगणना की आवश्यकता नहीं है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क से असहमति जताई। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “यह पूरी तरह से नीति से जुड़ा विषय है कि जनगणना जाति के आधार पर कराई जाए या नहीं। सरकार को यह जानना जरूरी है कि पिछड़े वर्गों की आबादी कितनी है और उनके लिए किस प्रकार की कल्याणकारी योजनाएं बनाई जानी चाहिए।”

Diarch GO


दरअसल, केंद्र सरकार ने हाल ही में आगामी जनगणना में जातिगत आंकड़े शामिल करने का फैसला लिया है। वर्ष 2027 में होने वाली जनगणना देश की 16वीं राष्ट्रीय जनगणना होगी। खास बात यह है कि 1931 के बाद पहली बार सभी जातियों की व्यापक गणना की जाएगी। इससे पहले ब्रिटिश शासन के दौरान 1931 में आखिरी बार विस्तृत जातिगत जनगणना कराई गई थी।


यह जनगणना कई मायनों में ऐतिहासिक मानी जा रही है, क्योंकि यह भारत की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना भी होगी। सरकार मोबाइल एप और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए डेटा संग्रह की तैयारी कर रही है। इसके तहत जनसंख्या, सामाजिक आर्थिक स्थिति, शिक्षा, रोजगार और जातिगत आंकड़ों सहित कई महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाई जाएंगी।

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सरकार का कहना है कि जाति आधारित आंकड़ों से सामाजिक न्याय और कल्याणकारी योजनाओं को बेहतर तरीके से लागू करने में मदद मिलेगी, जबकि विपक्षी दल लंबे समय से इसकी मांग करते रहे हैं। वहीं, इस मुद्दे पर देशभर में राजनीतिक बहस भी तेज है।